पत्नी के शव को रिक्शे पर ले जाता किसान
- फोटो : Amar Ujala
उत्तर प्रदेश में शवों के लिए सरकारी एंबुलेंस या शव वाहनों की लचर व्यवस्था में फंसे किसान की सिसकियां गुरुवार को पूरे प्रयागराज में गूंज कर सिस्टम से सवाल करती रहीं, लेकिन किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। शहर भर में शवों को ढोने के लिए सरकारी एंबुलेंस या शव वाहनों की उपलब्धता नहीं है।
इस व्यवस्था में फंसा किसान गुरुवार को अपनी पत्नी के शव के साथ घंटों भटकता रहा, जगह-जगह गुहार लगाता रहा, लेकिन उसे कहीं से मदद नहीं मिली। मायूस होकर उसने अपने साथ भटक रहे बच्चों को किसी तरह बस से घर भेजा और फिर गरीबी और लाचारी में एसआरएन अस्पताल से रिक्शा ट्राली में पत्नी का शव रखकर शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर शंकरगढ़ तक खींच कर ले गया।
शंकरगढ़ से आए कल्लू की पत्नी के सिर में करीब पांच दिन पहले चोट लग गई थी, जिसके बाद उसे एसआरएन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। गुरुवार को उपचार के दौरान पत्नी सोना की सांस रुक गई। पति कल्लू जब शव को घर ले जाने के साधन खोजने लगा तो उसे एंबुलेंस नहीं मिली। बताया गया कि शव वाहन भी उपलब्ध नहीं है।
बताया गया कि निजी एंबुलेंस चालक की फीस तीन हजार रुपये है, तो वह भटकने लगा। मजबूरी में वह रिक्शा ट्राली पर पत्नी का शव रखकर घर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में उसकी हालत देखने वालों ने अफसोस जताया, लेकिन मदद को कोई आगे नहीं आया।
यह घटना जिम्मेदारों के लिए सबक बन सकती है, बशर्ते वे संवेदनशील बनें। सवाल है कि सौ से अधिक एंबुलेंस का बेड़ा शहर में है, लेकिन जरूरतमंद गरीबों के लिए शव वाहन की व्यवस्था नहीं है। इस संबंध में एसआरएन अस्पताल के एसआईसी डॉ. एके श्रीवास्तव ने अनभिज्ञता जताते हुए कहा कि उनके पास एंबुलेंस की मांग लेकर कोई आया ही नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर कल्लू उनके पास आता तो वह शव ले जाने की व्यवस्था जरूर कराते।