1994 में असांविधानिक घोषित हो चुका था हटाने वाला नियम
कर्मचारी ने उसी वर्ष अदालत की शरण ली। निचली अदालत ने 1985 में उसके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन बैंक की अपील पर यह निर्णय पलट गया। बाद की अपील भी खारिज हुई। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने वर्ष 2004 में उसकी रिट याचिका खारिज कर दी। इसके खिलाफ दायर अपील पर खंडपीठ ने मामले की नए सिरे से सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की अधिकतम परिवीक्षा अवधि 19 जनवरी 1983 को समाप्त हो गई थी। इसके बाद बिना किसी आदेश के सेवा जारी रहने से वह स्थायी कर्मचारी माना जाएगा। लिहाजा, 11 मार्च 1983 की कार्रवाई को स्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्ति के रूप में देखा जाएगा।
कोर्ट ने यह भी पाया कि जिस नियम के तहत कर्मचारी को हटाया गया था, उसे हाईकोर्ट 1994 में ही असांविधानिक घोषित कर चुका था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सांविधानिक न्यायालय की ओर किसी नियम को असांविधानिक घोषित करने का प्रभाव केवल उस मामले के पक्षकारों तक सीमित नहीं रहता। संविधान के बाद बनाए गए और असांविधानिक घोषित नियम का अस्तित्व शुरू से ही समाप्त माना जाता है।
कोर्ट ने माना कि कर्मचारी अब करीब 70 वर्ष का है। इतने लंबे अंतराल के बाद उसे सेवा में वापस भेजना व्यावहारिक नहीं होगा। हालांकि, उसे अवैध रूप से सेवा से बाहर रखने के कारण बर्खास्तगी की तारीख से सेवानिवृत्ति तक के वेतन का 50 प्रतिशत देने का आदेश दिया। खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक के अध्यक्ष, महाप्रबंधक और शाखा प्रबंधक को एक माह में 50 प्रतिशत पिछला वेतन और सभी परिणामी सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश दिया। साथ ही बैंक पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।