जिले की कोरांव तहसील में एक बिहार भी बसता है। यहां कई ऐसे गांव हैं, जहां की अधिकांश आबादी बिहार व झारखंड से आई है। वहां पनप रहे नक्सली, माओवादी संगठन से अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए अधिकांश लोगों ने अपनी जमीन, घर आदि बेच इलाहाबाद के कोरांव में शरण ले ली। आज इनकी आबादी इलाहाबाद की राजनीति में दखल देने लगी है। कई ग्राम पंचायतों में इनकी सरकार बन गई तो कहीं दूसरे नंबर पर रहकर संतोष करना पड़ा।
वर्ष 1972 के बाद जब बिहार, छत्तीसगढ़ व झारखंड में तेजी से नक्सल मूवमेंट बढ़ने लगा तो खून खराबे से बचने के लिए कई परिवार अपना घर छोड़कर पलायन करने लगे। सैकड़ों परिवार इलाहाबाद के कोरांव में आकर बस गए। यहीं खेती-बारी कर जीवन यापन करने लगे। कोरांव की उबड़-खाबड़ व पहाड़ी जमीनों की कीमत उस समय 200 से 500 रुपये बीघा थी। दूसरे प्रदेशों से आने वाले परिवारों ने इन्हीं जमीनों को औने-पौने दाम में खरीद लिया था। वर्ष 1975 में बिहार के गया जिला से करीमन सिंह अपने पूरे परिवार के साथ कोरांव के रत्योरा करपिया आ गए। टूटी फूटी झोपड़ी में रहने के बाद परिवार का गुजर बसर नहीं हो रहा था। खेती के लिए पहाड़ों में हल चलाकर बीज भी बोए, लेकिन पैदावार नहीं हुई। हिम्मत नहीं हारने के साथ खेती को ही मुख्य व्यवसाय बनाया। आज उनके पास कुल आठ बीघा जमीन है। खेती से पूरे परिवार का खर्च चलता है। इसी के साथ उन्होंने अपने रिश्तेदारों को भी यहीं बुला लिया। गांव में जोगेंद्र सिंह, राजेंद्र सिंह, मुंशी सिंह समेत कई परिवार के लोग बिहार छोड़कर कोरांव में बस गए हैं।
इसी तरह वर्ष 2005 में झारखंड के पलामू जिले से बलजेवरी चौहान अपने परिवार के साथ कोरांव चले आए। उस समय झारखंड में नक्सली हमले बहुत होते थे। उनके बड़े लड़के की मौत एक नक्सली हमले में हो गई थी। छोटे लड़के की पढ़ाई और नक्सली हमले से बचने के लिए बलजेवरी चौहान ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। उस समय झारखंड में वनकर्मी के पद पर कार्यरत थे। इनके कई रिश्तेदार पहले से ही कोरांव में आकर बसे थे। वहीं रत्योरा करपिया गांव की प्रधान रामरती देवी भी मूलरूप से बिहार की रहने वाली हैं। उनके ससुर वर्ष 1980 में बिहार से कोरांव आए थे। पुरादत्तू, मझिगवां, खोचा पवारी, उंच गांव, छप्पर, बिरहा करपिया, नीबी समेत कई गांवों में दूसरे प्रदेशों से आकर लोग बसे हैं। सूत्रों की माने तो कोरांव में इनकी आबादी तीस हजार के आसपास है।
बढ़ गए जमीन के भाव
वर्ष 1970 के आसपास कोरांव पूरी तरीके से जंगल, झील व पहाड़ियों से भरा पड़ा था। लगातार आबादी के बढ़ने व आधुनिकता के दौर में काफी बदलाव हुए। 25 वर्ष पहले 200 से 500 रुपये की बिकने वाली जमीन की कीमत आज लाखों में है। इस समय 10 लाख बीघे के आसपास कृषि भूमि बिक रही है। जबकि बाजार व नगर पंचायत के जमीनों की कीमत करोड़ों रुपये आंकी जाती है।
करीब पांच बीघा जमीन बेचकर बिहार के देनारा थाना से कोरांव आए थे। परिवार के कई लोग अभी बिहार में ही रहते हैं। जिले की राजनीति में हमारे साथ भेदभाव किया जाता है।
रामानुज, पुरादत्तू, कोरांव
वर्ष 1989 में बिहार के रोहतास जिले से कोरांव आए थे। 4 बीघे की पुश्तैनी भूमि बेच दी थी। कोरांव में मेरे पास 6 बीघे जमीन है। बिहार की वजह से भेदभाव के शिकार होते हैं।
राम सिंहासन, करपिया, कोरांव
बिहार से आकर प्रधान बन जाऊंगी। यह विश्वास नहीं था। अपने गांव के सभी लोगों के लिए विकास कार्य करूंगी। पूरे क्षेत्र के लोगों की मूलभूत सुविधाओं का ख्याल रखूंगी।
रामरती देवी, प्रधान, रत्योरा करपिया, कोरांव