हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्य प्रणाली और लचर विवेचना पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि पुलिस की लापरवाही का फायदा अभियुक्तों को मिलता है। लचर विवेचना और कमजोर साक्ष्यों के कारण अदालतों को अभियुक्त छोड़ने पड़ते हैं। प्रदेश भर में आपराधिक मामलों की विवेचना के लिए पोस्टमार्टम के बाद सुरक्षित रखे बिसरा को जांच के लिए समय पर न भेजने के प्रकरण पर कोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह आरएम श्रीवास्तव और डीजीपी एसी शर्मा को तलब किया था। दोनों शुक्रवार को अदालत में हाजिर हुए।
डीजीपी ने न्यायालय को अवगत कराया कि पिछले तीन वर्षों में प्रदेश में एक लाख 38 हजार 500 पोस्टमार्टम किए गए हैं। इनमें से 88 प्रतिशत मामलों में बिसरा सुरक्षित करने की आवश्यकता पड़ी। सुरक्षित किए गए बिसरा में से 65 प्रतिशत को जांच के लिए समय पर भेजा गया जबकि 12 प्रतिशत मामलों में बिसरा जांच के लिए समय पर नहीं भेजा जा सका। डीजीपी ने आश्वासन दिया कि इन 12 प्रतिशत मामलों को भी शतप्रतिशत समय पर भेजने के लिए निर्देश जारी किए जा रहे हैं।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने डीजीपी के समक्ष पुलिसिया लापरवाही के कई मामले उठाए। उन्होंने गोरखपुर के एक मामले की जानकारी देते हुए कहा कि पुलिस ने मृत व्यक्ति को ही अभियुक्त बना दिया। इसी प्रकार से एमएलसी के गनरों की मौत के मामले में पुलिस ने मामले का खुलासा करने वाले को ही आरोपी बना दिया। जांच अधिकारी 164 सीआरपीसी का बयान नहीं दर्ज कर रहे हैं। पुलिस की जांच में घोर अराजकता है। इसकी वजह से पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता है।
कोर्ट ने सोनभद्र जिले में हत्या के मामले में अभियुक्त अनोज कुमार के जमानत प्रार्थनापत्र पर सुनवाई के दौरान पाया था कि प्रकरण में मृतका का बिसरा जांच के लिए सुरक्षित किया गया था मगर 17 माह से अधिक बीत जाने के बावजूद उसे जांच के लिए भेजा नहीं गया। इसके मद्देनजर पूरे प्रदेश से बिसरा रिपोर्ट के साथ अधिकारियों को तलब किया था।