पूरे महाकुंभ में नहीं सुलझा विवाद
अनी अखाड़े ने संन्यासी अखाड़ों से अलग वैष्णव परिषद बना लिया। महाकुंभ आरंभ होने के साथ अखाड़ा परिषद में छिड़े घमासान के शांत होने की संभावना जताई जा रही थी लेकिन, पूरे महाकुंभ के दौरान अखाड़ों के बीच चल रहा विवाद नहीं सुलझ सका। सभी अखाड़े अध्यक्ष एवं महामंत्री पद को लेकर ही अड़े हुए हैं। सुलह-सफाई न होने के पीछे भी अखाड़ा पदाधिकारी एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कुंभ के दौरान इनके बीच कोई संवाद नहीं हुआ।
अखाड़ा परिषद का विवादों से पुराना नाता
कुंभ एवं अर्ध कुंभ के दौरान अखाड़ों को एकजुट रखने के लिए वर्ष 1954 में अखिल भारतीय षटदर्शन अखाड़ा परिषद का गठन हुआ था लेकिन, अक्सर ही अखाड़ा परिषद विवादों में ही घिरा रहा। परंपरा के मुताबिक अध्यक्ष पद के लिए संन्यासी, वैरागी एवं उदासीन अखाड़े का क्रम तय हुआ। वर्ष 2004 में वैरागी अखाड़े से महंत ज्ञानदास अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद कुंभ में अध्यक्ष पद को लेकर विवाद छिड़ गया। महंत ज्ञानदास को अध्यक्ष बनाए जाने का विवाद कोर्ट तक भी पहुंचा। वर्ष 2012 में प्रयाग कुंभ बिना अखाड़ा परिषद अध्यक्ष के ही हुआ। कुंभ के बाद निरंजनी अखाड़े के तत्कालीन सचिव श्रीमहंत नरेंद्र गिरि अध्यक्ष बनाए गए। वर्ष 2019 का अर्धकुंभ उनके कार्यकाल में हुआ लेकिन, उनकी मृत्यु के बाद अध्यक्ष पद को लेकर दोबारा से विवाद उठ खड़ा हुआ।
एक-दूसरे के धार्मिक कार्यक्रमों से बनाए रखी दूरी
अखाड़ा परिषद में वर्चस्व की जंग इस कदर छिड़ी रही कि अखाड़ों ने एक-दूसरे के यहां होने वाले कार्यक्रमों में जाने को भी दर किनार कर दिया। महाकुंभ में महामंडलेश्वर की पदवी देने की परंपरा है। सभी अखाड़ों के प्रतिनिधि इसमें आकर चादरपोशी कार्यक्रम में शामिल होते हैं। एक तरह से इसे सभी अखाड़ों की ओर से महामंडलेश्वर को मान्यता देने की तरह देखा जाता है। पिछले कुंभ तक अखाड़ों ने यह परंपरा निभाई लेकिन, इस बार यह परंपरा टूट गई। धर्मध्वजा स्थापित होने के बाद उनका यह भाईचारा भी खत्म हो गया। वैष्णवों के प्रतिनिधि संन्यासी अखाड़ों में नहीं गए। संन्यासियों ने भी वैष्णव अखाड़ों से दूरी बनाए रखी। यहां तक संन्यासी अखाड़ों में भी आपसी आना-जाना बंद रहा। निरंजनी अखाड़े के पदाधिकारियों ने महानिर्वाणी में हुए अभिषेक कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी वहीं निरंजनी अखाड़े के पदाधिकारी भी उनके यहां आयोजित किसी पट्टाभिषेक कार्यक्रम में शामिल होने नहीं पहुचे।
जिसको पद की लालसा है, वह विवाद कर रहे हैं। विवाद करने वालों से किस तरह से समझौता किया जा सकता है। जिसे परिषद में रहना होगा, वह रहेगा। - श्रीमहंत रविंद्र पुरी, सचिव निरंजनी अखाड़ा
हमारे साथ आठ अखाड़े हैं। हम चुनाव कराना चाहते हैं। दूसरे लोग जर्बदस्ती अखाड़ा परिषद में कब्जा जमाना चाहते हैं। इस तरह से अखाड़ा परिषद नहीं चलाया जा सकता। पंचायती रीति से ही इसका संचालन हो सकता है। - श्रीमहंत यमुना पुरी, सचिव महानिर्वाणी अखाड़ा
संन्यासी अखाड़े मनमानी कर रहे हैं। महामंत्री पद सालों से एक अखाड़े के पास है जबकि परिषद में अध्यक्ष एवं अन्य पदों के लिए क्रम तय किया गया था। इस क्रम के मुताबिक अनी अखाड़ों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा रहा है। इस वजह से अनी अखाड़े अलग रहे। नासिक कुंभ में अगर प्रतिनिधित्व मिलेगा तब ही अनी अखाड़े अब इसमें शामिल होंगे। - श्रीमहंत राजेंद्र दास, राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय निर्मोही अनी अखाड़ा