डॉ रामकुमार वर्मा की वह मेज जिस पर बैठकर वह नियमित लेखन करते थे।
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बाल साहित्यकारों को प्रेरित करते थे डॉ. वर्मा
इसका भावार्थ है कि जहां तक मेरा वश चला, मैंने आज तक कभी किसी का बुरा नहीं किया। डॉ. राजलक्ष्मी का कहना है कि पढ़ाने और लिखने से लेकर सामान्य व्यवहार में भी वह न किसी की आलोचना करते थे और सुनना पसंद करते थे। बाल साहित्यकारों को वह प्रेरित करने के लिए अपने पास से धनराशि तक दे देते थे।
‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक रविनंदन सिंह ने बड़े लेखकों के डॉ.रामकुमार वर्मा के साहित्य को लेकर की गईं टिप्पणियों को संग्रहीत किया है। उनके मुताबिक जीवन में प्रारंभ से ही प्रतिभा के स्पष्ट चिह्न दिखाई देते थे बालक रामकुमार में। अपनी कक्षा में सदैव प्रथम स्थान पर आया करते थे। उन्होंने अभिनेता बनने की बड़ी इच्छा जताई थी। इसीलिए अपने विद्यार्थी जीवन में कई नाटकों में एक सफल अभिनेता का कार्य किया है। बाद में एकांकी नाटक लेखन के वह सूत्रधार बन गए।
रामकुमार वर्मा जी की वत्सल छांव में, यश मालवीय और उनका बेटा सौम्य। फाइल फोटो
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डॉ.रामकुमार वर्मा ने देश ही नहीं, विदेशों में भी हिंदी का परचम लहराया। 1957 में वे मास्को विश्वविद्यालय के अध्यक्ष के रूप में सोवियत संघ की यात्रा पर गए। 1963 में उन्हें नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय ने शिक्षा सहायक के रूप में आमंत्रित किया। 1967 में वे श्रीलंका में भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष के रूप में भेजे गए। ‘चित्ररेखा’ काव्य-संग्रह पर इन्हें हिंदी का सर्वश्रेष्ठ देव पुरस्कार..मिला है। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से नवाजा था।
अपनी भाषा पर गर्व करें, जूठन की ओर क्यों ताकें
डॉ.रामकुमार वर्मा ने एक बार कहा था कि ‘जिस देश के पास हिंदी जैसी मधुर भाषा है वह देश अंग्रेजी के पीछे दीवाना क्यों है? स्वतंत्र देश के नागरिकों को अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए। हमारी भावभूमि भारतीय होनी चाहिए। हमें जूठन की ओर नहीं ताकना चाहिए।’