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स्मृतिशेष : कर्म के धरातल पर अत्यन्त समृद्ध थे, डॉ. मनमोहन सिंह - आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पांडेय

Fri, 27 Dec 2024 08:28 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने दस वर्षीय प्रधानमत्रित्व काल में 'देशहित' को सर्वोपरि रखा था। आज हम  राजनीति मे 'भेंड़िया-जैसा' चरित्र भी देख रहे हैं; पद-प्रतिष्ठा पाने और अपनी कुर्सी बचाने के लिए छल-छद्म करने की रीति-नीति का वभत्स रूप प्रतिक्षण देखते आ रहे हैं, उससे नितान्त परे उनका जीवन था।
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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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 "हज़ारों जवाबों से अच्छी है मेरी ख़ामोशी,

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न जाने कितने सवालों की आबरू रखी।''


अपनी इसी ख़ामोशी के साथ 26 दिसम्बर, 2024 ई० को फेफड़े में गंभीर संक्रमण हो जाने के कारण 92 वर्ष की आयु मे रात्रि में नौ बजकर 51 मिनट में हम सबके प्यारे पूर्व-प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इस असार संसार का त्याग कर चुके थे। उनके शरीरांत के पश्चात् उनकी वही 'ख़ामोशी' इन दिनों मुखर होकर सबको बेचैन कर रखी है। सत्ता के गलियारे मे चहलक़दमी करनेवाले वे लोग, जो कल तक उनके लिए न जाने कितने असंसदीय शब्द प्रयोग करते रहे; नाना आरोप-तीर से घायल करते रहे, अब नतमस्तक हैं, मानो उन्हें अपने भर्त्सनापूर्ण आचरण का अनुभव हो रहा हो।

डॉ. सिंह ने अपने दसवर्षीय प्रधानमत्रित्व काल में 'देशहित' को सर्वोपरि रखा था। आज हम  राजनीति मे 'भेंड़िया-जैसा' चरित्र भी देख रहे हैं; पद-प्रतिष्ठा पाने और अपनी कुर्सी बचाने के लिए छल-छद्म करने की रीति-नीति का वभत्स रूप प्रतिक्षण देखते आ रहे हैं, उससे नितान्त परे उनका जीवन था। उन्होंने कभी प्रधानमंत्री-पद पाने की अपनी चाह तक व्यक्त नहीं की थी; भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की शीर्षस्थ नेत्री सोनिया गांधी उनतक चलकर पहुंची थीं और प्रधानमंत्री-पद स्वीकार करने के लिए आग्रह किया था।
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वे वाचाल नहीं थे; आत्मप्रशंसक भी नहीँ थे; सत्तालोलुप नहीं थे; विपक्षी दल के लिए कभी अपशब्द का प्रयोग नहीं करते थे। सच तो यह है कि उन्होंने किसी नेता-नेत्री को आरोपित तक नहीं किया। वे न तो भाषणो मे जोश दिखाते थे और न ही किसी विवाद को जन्म देते थे। वास्तव मे, उनका काम ही उनकी पहचान थी। उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे देशवासियों को कभी झूठा आश्वासन नहीं देते थे; जो भी करते थे, शालीनता के साथ। आज के बड़बोले नेता-नेत्रियों को उनसे सीख ग्रहण करनी चाहिए।

नहीं होगा उनके जैसा कोई अर्थशास्त्री
  
उन-जैसा व्यावहारिक भारतीय अर्थशास्त्री न कल था और न ही आज है; भविष्य मे भी कोई नज़र नहीं आ रहा है। डॉ. मनमोहन सिंह-जैसा सुशिक्षित एवं अनुभव-संपन्न प्रधानमंत्री आज़ादी के बाद से आज तक कोई नहीं हुआ है और न ही दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है। उनका अर्थबोध अद्वितीय रहा है। हम यदि उसके क्रम को समझें तो वे  अर्थशास्त्र मे वरिष्ठ व्याख्याता, उपाचार्य (रीडर), प्राध्यापक थे। वे संयुक्त राष्ट्र-व्यापार एवं विकास-सम्मेलन (अंकटाड– यूएनसीटीएडी) में भी सक्रिय थे।

भारतीय रिज़र्व बैंक के निदेशक तथा गवर्नर, भारतीय औद्योगिक विकास बैंक के निदेशक, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, दक्षिण आयोग के महासचिव, विदेश व्यापार मंत्रालय के सलाहकार, 'दिल्ली स्कूल ऑव़ इकॉनमिक्स' अन्तरराष्ट्रीय व्यापार के प्राध्यापक, वित्त मन्त्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे। यही कारण था कि वे विषम आर्थिक परिस्थितियों को भी अपनी कुशाग्र बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए, अपने अनुकूल कर लेते थे। 

कई बार देश को आर्थिक संकट से उबारा

हमें वर्ष १९९१ का वह समय स्मरण करना होगा, जब विश्व गम्भीर आर्थिक संकट के दौर ग़ुज़र रहा था। वैसी विषम परिस्थिति मे पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में उन्हें वित्त मन्त्री बनाया गया था। उस समय भारत का विदेशी मुद्रा-भंडार रिक्त हो चुका था; देश पर अत्यधिक ऋण का दबाव था। ऐसे में, उनकी तीन आर्थिक नीतियां :– (1) उदारीकरण (2) निजीकरण (3) वैश्वीकरण भारत की अर्थव्यवस्था को एक नयी सकारात्मक ऊर्जा देती रहीं। उन्होंने अपनी सुशिक्षा और अनुभव के बल पर भारतीय अर्थ-व्यवस्था मे एक अभिनव युग का प्रारम्भ किया था। उनकी आर्थिक उदारीकरण की नीति 'मील का पत्थर' साबित हुई थी, जिसके अन्तर्गत उन्होंने व्यापार, उद्योग तथा निवेश के क्षेत्रों में लोकोपयोगी सुधार किए थे, जिससे भारत को वैश्विक अर्थतन्त्र के साथ जोड़ने मे सहायता मिली थी।

उन्होंने ही शासकीय उद्यमों को निजी क्षेत्र के लिए खोलने की शुरूआत की थी। निजीकरण के साथ ही विदेशी निवेश को भी प्रोत्साह करने का श्रेय उन्हें ही जाता था। उन्होंने ही विदेशी कम्पनियों को भारत मे निवेश करने के लिए आकर्षित किया था। उनकी नीतियों का ही परिणाम था कि सूझ-बूझ एवं दूरदर्शिता के साथ उन्होंने कई दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था मे सुस्त वृद्धि और भ्रष्टाचार के स्रोत 'लाइसेंस-परमिटराज' को समाप्त कर दिया था; कर (टैक्स) कम कर दिये थे। यही कारण था कि उनके वित्त मंत्रित्व-काल मे भारत की आर्थिक दशा-दिशा पूर्णत: स्वस्थ एवं समृद्धि रही। उन्होंने यह भी मौन घोषणा कर दी थी कि बिना ढिंढोरा पीटे भी बड़े बदलाव किये जा सकते हैं।

दस साल के कार्यकाल में कभी नहीं लिया अवकाश

 तत्कालीन संयुक्त राज्य अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी कृति ' ए प्रामिस्ड लैंड' मे डॉ. मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों की सराहना करते हुए लिखा था– वर्ष 1990 के बाद वे लगातार भारत को एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था बनाने मे तत्पर और सन्नद्ध रहे। वे भारत की अर्थव्यवस्था को ऊँचाई पर ले जानेवाले प्रमुख शिल्पी बने। डॉ. मनमोहन सिंह वर्ष 2004 से 2014 तक भारत के प्रधानमन्त्री बने रहे। उन्होँने अपने उन दसवर्षीय काल मे कभी अवकाश नहीं लिया था, सिवाय वर्ष २००९ मे जब उन्हें हृदय की बाईपास सर्जरी करानी पड़ी थी। वे प्रतिदिन 18 घंटे क्रियाशील थे। बताया जाता है कि वे प्रतिदिन 300 फ़ाइलोँ का परीक्षण करते थे।

डॉ. सिंह भारत के ऐसे चौदहवें प्रधानमंत्री थे, जो पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद पूरे पांच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने के अनन्तर पुन: निर्वाचित प्रथम प्रधानमन्त्री बने थे। उनके कार्यकाल मे शिक्षाक्षेत्र मे कई क्रान्तिकारी सुधार किये गये थे। उन्होँने 'शिक्षा का  अधिकार-अधिनियम' लागू किया था, जिसके अन्तर्गत छ: से चौदह वर्ष की बालक-बालिकाओं के लिए निश्शुल्क और अनिवार्य शिक्षा की प्रत्याभूति (गारंटी) दी गई थी। हमे भूलना नहीँ होगा कि डॉ० मनमोहन सिँह के नेतृत्व मे संचालित यूपीए -सरकार ने वर्ष 2006 में 'मनरेगा' (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी-अधिनियम) लागू किया था, जिसमे ग्रामीण भारत के निर्धन परिवार को 100 दिनों का प्रत्याभूतियुक्त रोज़गार देने की व्यवस्था रही।

रोजगार के क्षेत्र में किया उल्लेखनीय कार्य

उनके कार्यकाल मे भारत ने सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र मे वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनायी। बीपीओ और आइटी -उद्योग ने लाखों युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर उत्पन्न किये थे। टेलीकॉम-क्षेत्र मे कराए गए सुधार ने देश के कोने-कोने मे मोबाइल और इंटरनेट-संयोजकता का विस्तार किया था। उनकी दूरदर्शिता तब और मुखर रूप मे सामने आ गयी थी जब वर्ष 2008 मे भारत-संयुक्त राज्य अमेरिका का परमाणु-समझौता था, जो भारत को असैनिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र मे आत्मनिर्भर बनने की दिशा मे एक महत्त्वपूर्ण क़दम था। इसके द्वारा देश मे ऊर्जा-संकट को कम करने और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की नींव रखी गयी थी, हालाँकि उस समझौते को लेकर तत्कालीन प्रतिपक्षी नेताओं ने विरोध भी किये थे फिर भी डॉ. मनमोहन सिँह अपने निर्णय पर अटल बने रहे।

वर्ष 2011 मे सुषमा स्वराज ने संसद् मे अपने अभद्र आचरण का परिचय देते हुए-चीख़ते हुए, प्रश्नात्मक शैली मे एक शे'र के माध्यम से तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को ललकारा था :–

"तू इधर-उधर की न बात कर, 
ये बता कि ये काफ़िला क्यों लुटा,
मुझे रहजनों से गिला नहीँ, तिरी रहबरी का सवाल है।"


इसपर डॉ. मनमोहन सिँह ने अत्यन्त शालीनता के साथ जो जवाब दिया था, उससे सुषमा स्वराज पानी-पानी हो गयी थीँ। उन्होँने 'अल्लामा इक़बाल' के एक शे'र सुनाकर जवाब दिया था।

"माना कि तेरे दीद के क़ाबिल नहीं हूं मैं
तू मेरा शौक देख, मिरा इन्तिज़ार देख।"


आज देश के प्रमुख सत्ताधारी नेता जिस मनमोहन सिँह की तारीफ़ मे कसीदे पढ़ रहे हैं, वही जब विपक्ष मे होते थे तब डॉ. मनमोहन सिंह को 'विदेशी ताक़तों के  जासूस' और 'देशद्रोही' कहा करते थे। इतना ही नहीँ, उनके कार्यकाल मे तत्कालीन विपक्षी नेताओं ने एक गहरी साज़िश रचते हुए, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल , बाबा रामदेव, किरन बेदी एंड कम्पनी का इस्तेमाल करके देशव्यापी आन्दोलन चलाया था, जिसके कारण आगे चलकर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बहुमुखी पतन हुआ था। उनकी कार्यावधि मे प्रतिपक्षियों ने २-जी स्पेक्ट्रम, कोलगेट, कॉमनवेल्थ-जैसे घोटालोँ के आरोप लगाये थे। इतना ही नहीं, एक गहरी साज़िश के अन्तर्गत वर्ष 2008 में उनकी सरकार संकट मे घिर आयी थी, तब संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन मे सम्मिलित वामपन्थी दलों ने अपना समर्थन वापस ले लिया था; किन्तु मुलायम सिंह और मायावती के समर्थन से उनकी सरकार भंग होने से बचा ली गयी थी।
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पाक के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ ने की थी तारीफ

उन विपक्षी नेताओं के गालों पर ज़ोरदार तमाचे तब पड़े थे जब न्यायालय की ओर से सुस्पष्ट कर दिया गया था कि उपर्युक्त सारे आरोप आधारहीन थे; क्योंकि वे सारे आरोप बिना किसी ठोस सुबूत के थे। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ से जब पूछा गया था, "मनमोहन सिंह कैसे प्रधानमन्त्री हैं?'' तब मुशर्रफ़ ने कहा था, "डॉ. मनमोहन सिंह इज ए नाइस प्राइम मिनिस्टर।" इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि भारत के तत्कालीन विपक्षी नेता मनमोहन सिंह पर अभद्र टिप्पणी कर रहे हैं; मगर भारत का धुर-विरोधी शत्रु पाकिस्तान देश का राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ डॉ. मनमोहन सिंह की प्रशंसा कर रहा है। 

हम डॉ मनमोहन सिंह को एक महान प्रधानमंत्री क्यों विश्लेषित करते आ रहे है? इसका उत्तर सुस्पष्ट है कि वे प्रधानमंत्री-पद की कुर्सी से चिपके रहना नहीं चाहते थे। उन्होंने तो वर्ष 2014 मे सुस्पष्ट शब्दों मे कह दिया था, "मै तीसरी बार प्रधानमंत्री नहीं बनूंगा। इतिहास मेरे साथ 'समकालीन मीडिया' और 'विपक्ष' से ज़्यादा इंसाफ़ करेगा।'' इस समय विश्व देख और अनुभव कर रहा है कि बिका और डरा हुआ समकालीन मीडिया और तत्कालीन प्रमुख प्रतिपक्षी राजनेता डॉ. मनमोहन सिंह को हर तरह से अपमानित करते आ रहे थे, उनमे से जो जीवित हैँ, वे आज घुटनो के बल रेँगते हुए, उस महान् अर्थशास्त्री और संयमित राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री के कर्त्तृत्व के प्रति नतमस्तक दिख रहे हैं।
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