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वर्चस्व की जंग: प्रथम शाही स्नान के लिए संतों के बीच कई बार हो चुका है युद्ध, संगम और हरिद्वार में हुआ रक्तपात

Fri, 20 Dec 2024 12:31 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

कुंभ और महाकुंभ में स्नान क्रम का निर्धारण अखाड़ों की ताकत के आधार पर किया गया है।'' दशनाम नागा संन्यासी'' नामक महंत लालपुरी की पुस्तक में कुंभ पर्व के समय प्रथम स्नान के लिए मुगलकाल और फिर ब्रिटिश हुकूमत के समय पांच बड़े युद्धों का उल्लेख मिलता है।
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नागा संन्यासी। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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कुंभ और महाकुंभ में शाही स्नान के लिए कई बार युद्ध हुए हैं। तब कुंभ में प्रथम स्नान के लिए लड़ाई की मुख्य वजह सनातन संस्कृति की पक्षधर सत्ता का नहीं होना था। उस दौर की सरकारों की ओर से कुंभ पर्व के लिए न तो कोई बजट दिया जाता था और ना ही किसी तरह की सुविधा और सुरक्षा। ऐसे में अलग-अलग समूहों के लोग अपनी संगठित शक्ति के आधार पर कुंभ में प्रथम स्नान का दावा करते थे। इसके लिए संगम से लेकर हर की पैड़ी तक कई बार रक्तपात के प्रमाण मिले हैं।

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कुंभ और महाकुंभ में स्नान क्रम का निर्धारण अखाड़ों की ताकत के आधार पर किया गया है।'' दशनाम नागा संन्यासी'' नामक महंत लालपुरी की पुस्तक में कुंभ पर्व के समय प्रथम स्नान के लिए मुगलकाल और फिर ब्रिटिश हुकूमत के समय पांच बड़े युद्धों का उल्लेख मिलता है। ''कुंभ पर्वों के स्नान क्रम'' नामक अध्याय में लालपुरी लिखते हैं कि देश में मुगलों के बाद ब्रिटिश शासन में सनातन संस्कृति को घोर उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था।

सनातन संस्कृति के सबसे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक मेले के तौर पर कुंभ और महाकुंभ के लिए किसी तरह की राजकीय सहायता प्राप्त नहीं होती थी। इस वजह से हर समुदाय के लोग अपनी शक्ति और संगठन के बल पर प्रथम स्नान का प्रयास करते थे। इस वजह से कुंभ में प्रथम स्नान के लिए लड़ाइयां स्वाभाविक थीं। लालपुरी ने कुंभ पर्वों में पांच ऐसे बड़े युद्धों का जिक्र किया है, जो सिर्फ प्रथम स्नान के लिए लड़े गए।

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मुगल बादशाह जहांगीर के समय प्रयागराज के 1621 के महाकुंभ में प्रथम स्नान के लिए उदासी और वैरागी परंपरा के साधुओं में भीषण लड़ाई हुई। युद्ध की खबर मिलने पर जहांगीर खुद मौके पर पहुंचा, लेकिन साधुओंके बीच लड़ाई का वह तमाशा देखता रहा। उसने अपनी शाही सेना को हस्तक्षेप के लिए निर्देशित तक नहीं किया। इसी तरह दविस्तान नामक ग्रंथ में 1050 ईस्वी में हरिद्वार कुंभ के समय नागा संन्यासियों और वैरागियों में हुए युद्ध का वर्णन मिलता है। इस पुस्तक में उद्धरण मिलता है कि तब वैरागियों ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए तिलक, तुलसी माला छोड़कर कनकटे जोगियों का छद्म वेश धारण कर लिया था।

इसी तरह ब्रिटिश सेना के अफसर कैप्टन हार्डविक ने वर्ष 1796 के हरिद्वार कुंभ में स्नान के लिए 14 हजार सिख सैनिकों की ओर से नागा संन्यासियों पर हमला बोलने की बात लिखी है। हार्डविक ने लिखा है कि इस युद्ध में पांच हजार नागा संन्यासी शहीद हुए। इसी तरह 1807 के हरिद्वार कुंभ में प्रथम स्नान के लिए नागा संन्यासियों और वैरागियों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इसमें भी जमकर रक्तपात होने से हरकी पैड़ी लाल हो गई थी। इसी तरह उज्जैन के कुंभ में वारागी साधुओं ने बल पूर्वक प्रथम स्नान करने का प्रयास किया था। तब नागाओं के हमले में सैकड़ों वैरागी साधु शहीद हो गए थे ।
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शक्ति के आधार पर अखाड़ों के शाही स्नान के क्रम का हुआ है निर्धारण

महंत लाल पुरी बताते हैं कि इसी के बाद ब्रिटिश सरकार ने युद्धों के प्रमाणों और ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर सभी 13 अखाड़ों के शाही स्नान के क्रम का निर्धारण किया। इसके तहत प्रथम शाही स्नान का अधिकार नागा संन्यासियों को दिया दया। दूसरे स्थान पर वैरागी परंपरा के साधुओं को शाही स्नान करने की व्यवस्था दी गई है। उदासीन परंपरा के अखाड़े तीसरे नंबर पर और अंत में निर्मल अखाड़े के साधु शाही स्नान करते हैं।
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