मुगल बादशाह जहांगीर के समय प्रयागराज के 1621 के महाकुंभ में प्रथम स्नान के लिए उदासी और वैरागी परंपरा के साधुओं में भीषण लड़ाई हुई। युद्ध की खबर मिलने पर जहांगीर खुद मौके पर पहुंचा, लेकिन साधुओंके बीच लड़ाई का वह तमाशा देखता रहा। उसने अपनी शाही सेना को हस्तक्षेप के लिए निर्देशित तक नहीं किया। इसी तरह दविस्तान नामक ग्रंथ में 1050 ईस्वी में हरिद्वार कुंभ के समय नागा संन्यासियों और वैरागियों में हुए युद्ध का वर्णन मिलता है। इस पुस्तक में उद्धरण मिलता है कि तब वैरागियों ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए तिलक, तुलसी माला छोड़कर कनकटे जोगियों का छद्म वेश धारण कर लिया था।
इसी तरह ब्रिटिश सेना के अफसर कैप्टन हार्डविक ने वर्ष 1796 के हरिद्वार कुंभ में स्नान के लिए 14 हजार सिख सैनिकों की ओर से नागा संन्यासियों पर हमला बोलने की बात लिखी है। हार्डविक ने लिखा है कि इस युद्ध में पांच हजार नागा संन्यासी शहीद हुए। इसी तरह 1807 के हरिद्वार कुंभ में प्रथम स्नान के लिए नागा संन्यासियों और वैरागियों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इसमें भी जमकर रक्तपात होने से हरकी पैड़ी लाल हो गई थी। इसी तरह उज्जैन के कुंभ में वारागी साधुओं ने बल पूर्वक प्रथम स्नान करने का प्रयास किया था। तब नागाओं के हमले में सैकड़ों वैरागी साधु शहीद हो गए थे ।
शक्ति के आधार पर अखाड़ों के शाही स्नान के क्रम का हुआ है निर्धारण
महंत लाल पुरी बताते हैं कि इसी के बाद ब्रिटिश सरकार ने युद्धों के प्रमाणों और ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर सभी 13 अखाड़ों के शाही स्नान के क्रम का निर्धारण किया। इसके तहत प्रथम शाही स्नान का अधिकार नागा संन्यासियों को दिया दया। दूसरे स्थान पर वैरागी परंपरा के साधुओं को शाही स्नान करने की व्यवस्था दी गई है। उदासीन परंपरा के अखाड़े तीसरे नंबर पर और अंत में निर्मल अखाड़े के साधु शाही स्नान करते हैं।