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नहीं रहे लोकभारती प्रकाशन के संस्थापक दिनेश चंद्र ग्रोवर

Sat, 24 Jun 2017 02:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद। प्रतिष्ठित लोकभारती प्रकाशन के संस्थापक दिनेश चंद्र ग्रोवर नहीं रहे। वह 86 वर्ष के थे। बृहस्पतिवार को सिविल लाइंस स्थित लोकभारती पुस्तक केंद्र से बाथरूम की ओर जाते हुए सीढ़ी पर उनके पैर लड़खड़ाए और वह गंभीर रूप से चोटिल हो गए। उन्हें फौरन अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन शुक्रवार की सुबह उनकी सांसें थम गईं। यह खबर सुनते ही बड़े भाई रमेश चंद्र ग्रोवर सहित पूरा परिवार स्तब्ध रह गया। वह अपने पीछे पत्नी और तीन बेटियों का परिवार छोड़ गए हैं। बेटी शुचि अमेरिका में है।

शाम को रसूलाबाद घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। बड़ी बेटी दिव्याराज ने उन्हें मुखाग्नि दी। घाट पर पत्नी, बेटी वनिका सहित अन्य महिलाएं भी पहुंचीं। इससे पहले उनके संध्याविहार स्थित आवास पर शुभचिंतकों, करीबियों, रचनाकारों, बुद्धिजीवियों के आने का क्रम बना रहे। उन्हें घर और घाट पर श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचने वालों में न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता, न्यायमूर्ति बी अमित स्थालेकर, दूधनाथ सिंह, प्रो.राजेंद्र कुमार, प्रो.हेरंब चतुर्वेदी, प्रो.अनीता गोपेश, हरीश्चद्र पांडे, अनिल रंजन भौमिक, श्रीरंग पांडे, लोकभारती प्रकाशन के आमोद माहेश्वरी सहित लोकभारती परिवार के सदस्य मौजूद थे।
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एक  भले इंसान होने के साथ ही वह प्रकाशन जगत के इनसाइक्लोपीडिया थे। उन्हें त्रिवेंद्रम से लेकर कश्मीर तक के हिंदी बुक स्टाल के नाम-पते जबानी याद थे। उन्हें प्रकाशन जगत का गहरा अनुभव था।
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0 दूधनाथ सिंह

प्रकाशन जगत से जुड़ा महत्वपूर्ण व्यक्ति चला गया। वह एक अच्छे इंसान, अच्छे प्रकाशक, अच्छे पुस्तक विक्रेता होने के साथ ही साहित्य के अच्छे पारखी थे।
0 प्रो. राजेंद्र कुमार
वह समानांतर के शुभचिंतक, चनाकारों के अच्छे मित्र और सहयोगी थे। नई-पुरानी पीढ़ियों के बीच वह किसी सेतु की तरह थे। वह पाठकों, रचनाकारों दोनों को हमेशा प्रोत्साहित करते थे।
0 प्रो अनीता गोपेश/अनिल रंजन भौमिक

दिनेश जी का जाना साहित्य जगत की बड़ी क्षति है। उन्हें साहित्य की किताबों के बारे में अद्भुत ज्ञान था। प्रकाशन जगत के तो वह पुरोघा ही थे।
0 यश मालवीय

वह इलाहाबाद की वाचिक परंपरा के शक्तिशाली पीठ थे। वह आजादी के बाद के साहित्यिक संस्मरणों की जिंदा डायरी थे, जिसे पढ़ना सुखद होता था।
0 रविनंदन सिंह

हिंदी जगत का सबसे छायादार वटवृक्ष हमेशा के लिए ढह गया। वह नए पुराने के बीच की शानदार कड़ी थे।
0 जयकृष्ण राय तुषार
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