प. बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियां संगमनगरी पहुंचीं तो उनके राजनीतिक जीवन सहित इलाहाबाद से जुड़ीं यादें भी ताजा हो गईं। उनके राजनीतिक जीवन से लेकर व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं पर ‘अमर उजाला’ ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पंडित केशरीनाथ त्रिपाठी से बातचीत की तो अतीत के पृष्ठ खुलते ही चले गए।
उन्होंने अटल जी को पूरे मन से याद किया। कहा, वर्ष 1957 में मेरा उनसे व्यक्तिगत परिचय हुआ था। इसके बाद कई मंचों पर उनके साथ उपस्थित रहने का मौका मिला। आयु में वह मुझसे तकरीबन दस वर्ष बड़े थे लेकिन हमेशा उनका स्नेह मुझे मिलता रहा। वर्ष 1991 के चुनाव के बाद जब उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने की बात आई तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बारे में उन्होंने मुझसे बात की थी। इस संबंध में मैंने उन्हें कुछ सुझाव भी दिए थे। उनमें सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता थी। आयु में अपने से छोटे को भी वह बहुत सम्मान देते थे। सरकार बचाने के लिए सिर्फ एक वोट की दरकार थी। उनके लिए सौदेबाजी का सहारा लेना कठिन नहीं था, लेकिन उन्होंने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। यह कदम स्वस्थ राजनीति का परिचायक है। उन्होंने शुचिता पर आधारित राजनीति की।
मेरा और उनका पारस्परिक विश्वास सदैव बना रहा। राजनीतिक संबंध के अतिरिक्त मेरा उनका वकील और मुवक्किल का रिश्ता भी रहा क्योंकि मैंने उनकी एक चुनाव याचिका पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अटल जी की ओर से बहस भी की थी। उत्तर प्रदेश विधानसभा का अध्यक्ष बनाने में उन्होंने और आडवाणी जी ने मेरे नाम का प्रस्ताव दिया था। तीसरी बार भी अटल जी ने व्यक्तिगत रूप से फोन करके कहा था विधानसभा का अध्यक्ष बनना पड़ेगा। इलाहाबाद में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे तब अटल जी का इलाहाबाद आना हुआ था। मैं उनके साथ चुनाव दौरे पर गया। तभी पारस्परिक वार्ता में अटल जी ने यह विश्वास दिलाया था कि वह दिन दूर नहीं जब केंद्र में अपने दम पर भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाएगी। बाद में उनकी वाणी सच हुई। अटलजी के जाने से मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत दुख हुआ। शब्द, नि:शब्द और वाणी मूक हो गई है। अटल जी ने राजनीति में अनेक आदर्शों की स्थापना की। वह भारत में स्वस्थ्य राजनीति के ध्रुवतारा थे।