इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस के आरोप पत्र पर संज्ञान लेने के बाद जारी विवेचना में क्लीनचिट (फाइनल रिपोर्ट) को ट्रायल कोर्ट नजरअंदाज नहीं कर सकता। क्योंकि, फाइनल रिपोर्ट मूल रिपोर्ट का ही हिस्सा है। लिहाजा, आदेश पारित करने से पहले ट्रायल कोर्ट को प्रारंभिक आरोप पत्र और अंतिम रिपोर्ट का एक साथ मूल्यांकन करना चाहिए।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अनिल कुमार-नवम ने कन्नौज निवासी सोनू उर्फ भगवान भक्त व छह अन्य की आपराधिक अपील पर की है। 2023 में कन्नौज के कोतवाली थाने में याचियों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने 15 सितंबर 2023 को चार्जशीट दाखिल की, जिस पर कोर्ट ने संज्ञान ले लिया। इसके बाद जारी रही विवेचना के बाद पुलिस ने 31 मार्च 2024 को पूरक रिपोर्ट दाखिल कर कहा कि याचियों के खिलाफ लगे आरोप असत्य पाए गए है।
हालांकि, पुलिस की क्लीनचिट रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए ट्रायल कोर्ट ने सात अगस्त 2025 को याचियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए। इसके खिलाफ याचियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।कोर्ट ने आरोप तय करने समेत ट्रायल कोर्ट के पिछले सभी आदेशों को रद्द कर दिया है। मामले को वापस भेजते हुए निर्देश दिया गया है कि प्रारंभिक आरोप पत्र और फाइनल रिपोर्ट दोनों पर विचार कर नए सिरे से आदेश पारित करें। रजिस्ट्रार (अनुपालन) को यह आदेश प्रदेश की सभी जिला अदालतों को भेजने का निर्देश दिया गया है, ताकि भविष्य में ऐसी प्रक्रियात्मक गलती न हो।