गंगा, यमुना, विलुप्त सरस्वती के संगम तट पर पितृपक्ष में श्राद्ध और पिंडदान से पूर्वजों को मोक्ष मिलने की पौराणिक मान्यता रही है। आम धारणा है कि संगम तट पर पिंडदान करने से पितरों को शांति मिल जाती है। ऐसे में शनिवार को आश्विन कृष्णपक्ष की पूर्णिमा तिथि पर सुबह से ही संगम तट पर पिंडदान, तर्पण का सिलसिला शुरू होगा।
इससे पहले शुक्रवार को चतुर्दशी तिथि पर अकाल मृत्यु की वजह से भटकती आत्माओं की शांति के लिए विधि-विधान से पूजन और पिंडदान की परंपरा है। ऐसे में संगम तट पर पिंडदान के लिए देश के कई हिस्सों से लोग पहुंचेंगे। वेदियों पर ध्वजा, पताका सजाकर मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान और तर्पण कर अपने पूर्वजों को लोग श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे।
तीर्थपुरोहित राजमणि तिवारी बताते हैं कि संगम पर पिंडदान और तर्पण करने से पूर्वजों की आत्माओं को शांति मिलती है। यहां तर्पण और पिंडदान किए बिना दिवंगत की आत्मा अतृप्त रहती है। पितृपक्ष में पिंडदान करने से पूर्वज प्रसन्न होकर वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पिंडदान नहीं करने से वंशजों को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि देश भर से लोग लोग पिंडदान के लिए संगमनगरी पहुंच रहे हैं। इसी तरह तीर्थ पुरोहित श्रवण पांडेय और प्रदीप पांडेय के मुताबिक इस बार पड़ोसी देश नेपाल, इंडोनेशिया और मारीशस से भी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए वंशजों के प्रयागराज पहुंचने की उम्मीद है।