इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रयाग संगम क्षेत्र में गंगा किनारे कृत्रिम तालाब में मूर्ति विसर्जन की मांग में दाखिल जनहित याचिका खारिज कर दी है। कहा है, वर्ष 2019 से अंदावां में इसी उद्देश्य से बने तालाब में मूर्ति विसर्जन किया जा रहा है। शासन ने समुचित सुविधाएं मुहैया कराई है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल तथा न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की खंडपीठ ने पीके राय तथा अन्य की जनहित याचिका पर हस्तक्षेप करने से इन्कार करते हुए दिया है।
याची के अधिवक्ता वीसी श्रीवास्तव ने मूर्ति विसर्जन के बारे में पूर्व में पारित आदेश की जानकारी देते हुए कहा था कि जिला प्रशासन कोर्ट आदेश की अवहेलना कर रहा है। जबकि कोर्ट का आदेश जिला प्रशासन पर बाध्यकारी है। मूर्ति विसर्जन धार्मिक परंपरा एवं देवी भक्तों की ओर से शांति जल लिए जाने से जुड़ी हुई है। किसी भी स्थिति में मूर्ति विसर्जन गांव के गंदे तालाब में नहीं किया जाना चाहिए। जिला प्रशासन शहर से 15 किमी दूर प्राकृतिक तालाब में मूर्ति विसर्जन करा रहा है जो कि सैकड़ों वर्ष पुराना है।
तालाब का पानी गंदा है। ऐसे तालाब में मूर्तियों का विसर्जन धार्मिक भावनाओं के अनुकूल नहीं है और न ही वहां किया जाना चाहिए। तर्क दिया गया कि प्रशासन कह रहा है कि वह गंगा के किनारे है और वहां गंगा का पानी ले जाया जा रहा है। जबकि, गंगा वहां से काफी दूर है। इसलिए बीते वर्षों की भांति गंगा के किनारे काली सड़क पर कृत्रिम तालाब बनाकर मूर्तियों का विसर्जन किया जाए।
जवाब में सरकारी अधिवक्ता की ओर से कहा गया कि बांध के नीचे की भूमि सेना की है। इसकी अनुमति नहीं मिली है। वहीं अंदावा का तालाब गंगा के किनारे है और मूर्ति विसर्जन की तैयारी जिला प्रशासन ने कर ली है। दो जेटी तैयार की गई है। 2019 से वहीं मूर्ति विसर्जन कराया जा रहा है।
याची के अधिवक्ता का कहना था कि जिला प्रशासन न्यायालय के आदेशों की अवमानना कर रहा है। वर्ष 2014, 2015 और 2021 के आदेश में कृत्रिम तालाब बनाकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी में मूर्ति विसर्जन कराने का निर्देश है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद याचिका 30 सितंबर को ही खारिज कर दी थी। दशहरा अवकाश के कारण आदेश अब अपलोड किया गया है।