समाज तेजी से बदलता है लेकिन कानून बनाने में विलंब होता है। सामाजिक परिवर्तन साझा सांस्कृतिक मूल्यों के विकास से ही संभव है। यह बात न्यायमूर्ति अजय भनोट ने रविवार को सीएमपी डिग्री कॉलेज में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि कही।
‘जेंडर एंड सेक्सुअल हेरसमेंट लॉ’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में न्यायमूर्ति अजय भनोट ने ऐतिहासिक आख्यानों, सांस्कृतिक मूल्यों और संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए लैगिंग समानता के सामाजिक विधिक विमर्श पर गहन प्रकाश डाला।
उन्होंने ‘संटी सेक्सुअल हेरसमेंट एक्ट’ के प्रावधानों एवं विशाखा मामले में किए गए संशोधनों पर प्रकाश डालते हुए न्यायिक वादों का उल्लेख किया। विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष शमीना शफीक ने कहा कि देश में कानून बनते हें लेकिन कानूनी भाषा सख्त एवं जटिल होने के कारण सरल रूप से ग्राह्य नहीं हैं। कानून सरल भाषा में होना चाहिए।
उन्होंने ‘मी टू मूवमेंट’ का जिक्र करते हुए कहा कि पीड़ित महिलाओं को समाज के सामने आकर चुप्पी तोड़ देनी चाहिए। अध्यक्षता कर रहे केपी ट्रस्ट के अध्यक्ष चौधरी जितेंद्र नाथ सिंह ने कहा कि ‘एंटी सक्सुअल हेरसटमेंट कानून’ के प्रति समाज में जागरूकता लाने के साथ इसके दुरुपयोग की संभावनाओं को भी समाप्त करना जरूरी है। कार्यक्रम की संयोजक डॉ. रुचिका वर्मा ने संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की।
प्राचार्य डॉ. बृजेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत, डॉ. गोविंद गौरव संचालन एवं डॉ. सरोज सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस दौरान 42 शोधपत्र भी प्रस्तुत किए गए। समापन सत्र की मुख्य अतिथि महिला अध्ययन केंद्र की निदेशक प्रो. अनामिका राय एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. शांति चौधरी रहीं।