जीवन ज्योति हॉस्पिटल के निदेशक डॉ. एके बंसल को जान पर खतरे के मद्देनजर करीब सवा साल पहले सरकारी सुरक्षा दी गई थी लेकिन बमुश्किल दो महीने बाद ही गनर हटा दिया गया था। डॉक्टर ने सरकारी सुरक्षा की खातिर एसएसपी से लेकर मुख्यमंत्री तक कई बार प्रार्थनापत्र भेजा लेकिन जिला सुरक्षा समिति ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। डॉक्टर के कत्ल के बाद सवाल उठ रहा है कि हमले के बाद खतरा था तो उन्हें गनर मुहैया कराकर क्यों हटा दिया गया?
डॉ.एके बंसल से प्रापर्टी विवाद और उनके खिलाफ मुकदमे तो कई साल से चल रहे थे लेकिन घातक हमला पहली दफा पांच सितंबर 2015 की रात हुआ जब वह हॉस्पिटल से जार्जटाउन में अमर नाथ झा मार्ग स्थित अपने निवास लौट रहे थे। घर के सामने ही उनकी इनोवा पर बदमाशों ने बम फेंके और फायरिंग की। हमले में गाड़ी को नुकसान पहुंचा हालांकि डॉ.बंसल और उनके साथ मौजूद राघवेंद्र प्रताप सिंह बाल-बाल बच गए थे। एक गोली गाड़ी के पीछे नंबर प्लेट के करीब धंसी थी। टूटे कांच और बम के अवशेष डॉ.बंसल की कमीज पर गिरे थे। उन्होंने बिल्डर संजीव अग्रवाल समेत चार लोगों के खिलाफ जार्जटाऊन थाने में जानलेवा हमले का केस दर्ज कराया था। कुछ दिन बाद विवेचना शाहगंज थाने भेज दी गई थी। हालांकि जांच में पुलिस हमलावरों का पता नहीं लगा सकी तो फाइनल रिपोर्ट लगा दी।
इस हमले के तीसरे रोज डॉ.बंसल की हिफाजत में पुलिस लाइन से एक 24 घंटे के लिए गनर (सिपाही) की तैनाती की गई थी। 12-12 घंटे में गनर की ड्यूटी बदलती थी। मगर डॉ.बंसल का पुलिस और प्रशासन का काम देखने वाले डॉ.राघवेंद्र प्रताप सिंह के मुताबिक, दो महीने बाद ही सरकारी सुरक्षा हटा दी गई थी।
डॉ.बंसल ने सुरक्षा बहाल करने की खातिर तब से दो बार एसएसपी को प्रार्थनापत्र दिया। एक बार उनकी अर्जी पर जिला सुरक्षा समिति की बैठक में विचार हुआ लेकिन डीएम ने एलआईयू की रिपोर्ट सकारात्मक नहीं होने का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था। कुछ महीने पहले डॉ.बंसल ने मुख्यमंत्री को भी प्रार्थनापत्र भेजा था मगर वहां भी शायद ध्यान नहीं दिया गया। डॉ.राघवेंद्र के मुताबिक, पहले डॉ.बंसल हिफाजत के लिए पिस्टल धारी निजी गार्ड रखते थे। हमले के बाद सरकारी गनर मिलने पर उन्होंने निजी गार्ड हटा दिया था क्योंकि वह गाड़ी में एक ही सुरक्षाकर्मी रखना चाहते थे। सरकारी गनर साथ होता तो शायद डॉ.बंसल पर हमला नहीं होता।
कहीं रिहर्सल तो नहीं था वो पहला हमला?
-करीब सवा साल पहले हुए हमले को तब पुलिस ने जांच में खारिज कर दिया था। फाइनल रिपोर्ट लगा दी गई थी। डॉ.बंसल ने निवास के बगल के प्लाट में बैग में बम मिलने और धमकी का केस दर्ज कराया तो उसमें भी पुलिस कुछ पता नहीं लगा सकी थी। पुलिस अफसर तो शक जताते थे कि पेशबंदी में केस लिखाया गया और फर्जी ढंग से खुद हमला करा लिया। मगर डॉ.बंसल की हत्या के बाद अब एसटीएफ को आशंका है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह हमला उनके किसी दुश्मन ने रिहर्सल के तौर पर कराया हो।
यह जानना चाहता रहा हो कि हमला करने पर क्या प्रतिक्रिया होती है? पुलिस क्या एक्शन लेती है? उस घटना में पुलिस शूटरों का नहीं पता लगा सकी तो पूरी तैयारी के बाद यह हमला किया गया। हालांकि सवा साल का अंतराल होने से कहा जा रहा है कि दुश्मन भला इतना क्यों इंतजार करेगा। यह भी एक खास बात है कि करोड़ों रुपये की मिल्कियत वाले डॉ.बंसल पहले हमले में क्षतिग्रस्त इनोवा को दुरुस्त कराने के बाद उसी गाड़ी में फिर चलने लगे थे।