केंद्रीय विभाग में तैनात कोई कर्मचारी अगर नि:शक्तता का शिकार हो जाता है और अपनी नि:शक्तता से संबंधित मेडिकल प्रमाणपत्र विभाग में सौंपता है तो संबंधित प्राधिकारी के लिए उसे नकारना आसान नहीं होगा। प्राधिकारी को इसके लिए पहले उच्च स्तर पर मेडिकल अथॉरिटी से बात करनी होगी। अगर मेडिकल अथॉरिटी भी कर्मचारी की नि:शक्तता पर मुहर लगाती है तो नि:शक्त घोषित किए जाने की तिथि के बाद से कर्मचारी ने जितने दिनों का अवकाश लिया है, उसकी कटौती कर्मचारी के अवकाश खाते से नहीं होगी और छुट्टी वापस खाते में जोड़ दी जाएगी। केेंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने इस बाबत आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं।
पर्सन्स विथ डिसेबिलिटी (पीडब्ल्यूडी) ऐक्ट, 1995 में यह व्यवस्था की गई है कि सेवाकाल के दौरान कोई कर्मचारी नि:शक्तता का शिकार हो जाता है तो विभाग में उस कर्मचारी को ऐसा काम दिया जाए, जो उसके हिसाब का होगा। अगर ऐसा काम नहीं है तो अलग से पद सृजित कर उसे काम दिया जाए और उसे मूल पद से जुड़ी पे-स्केल सहित अन्य लाभ दिए जाते रहें। अक्सर होता है कि कर्मचारी अपनी नि:शक्तता का प्रमाणपत्र विभाग में देता है तो संबंधित प्राधिकारी उसे मानने को तैयार नहीं होता। ऐसे में कर्मचारी को कोई नया काम नहीं मिल पाता है और उसे लंबी छुट्टी पर जाना पड़ता है। ऐसे में उसे नुकसान उठाना पड़ता है लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
डीओपीटी की ओर से जारी निर्देश में कहा गया है कि अगर कोई कर्मचारी अपनी नि:श्क्तता का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करता है और इसके बाद भी उच्च मेडिकल अथॉरिटी से इस बारे में पूछा जाता है तो इस बीच कर्मचारी की ओर से ली गई छुट्टी उस वक्त अवकाश खाते में वापस जोड़ दी जाएगी, जब उच्च मेडिकल अथॉरिटी भी उसकी नि:शक्तता पर मुहर लगा देगा। यानी नि:शक्त घोषित किए जाने की तिथि के बाद से लीव रूल-12 के तहत छुट्टी की अधिकतम सीमा ऐसे कर्मचारी पर लागू नहीं होगी। सिविल एकाउंट्स ब्रदरहुड के पूर्व अध्यक्ष हरिशंकर तिवारी ने इस आदेश का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे नि:शक्त कर्मचारियों को काफी राहत मिलेगी।