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पुलिस के हत्थे चढ़ा फर्जी आरजे संस्थान का संचालक

Tue, 19 Jun 2018 12:34 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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गिरफ्तार - फोटो : file photo
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रेडियो जॉकी (आरजे) बनाने के नाम पर छात्र-छात्राओं से लाखों रुपये की ठगी करने वाले संस्थान संचालक को पुलिस ने सोमवार को गिरफ्तार कर लिया है। उसके दो सहयोगियों को भी पुलिस ने पकड़ा है। इनके खिलाफ एक दिन पहले ही जार्जटाउन थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस पूछताछ में सामने आया है कि संस्थान फर्जी है और छात्रों से ठगी की गई। इन्होंने अभी तक कितने छात्र-छात्राओं को अपना निशाना बनाया, इसका खुलासा नहीं हुआ है। पुलिस इसकी जांच में लगी है। सभी तीनों आरोपी बनारस में भी वांछित चल रहे थे।
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एसएसपी नितिन तिवारी ने बताया कि स्कूल ऑफ ब्रॉडकॉस्टिंग नाम से टैगोर टाउन में संस्थान चलाया जा रहा था। संस्थान साईं स्टेट एंड एजुकेशन ट्रस्ट के अधीन था। इसका संचालक साईं शेखर तिवारी (ज्योति भूषण) है। इसके अलावा अल्लापुर का प्रशांत शुक्ला और राजापुर निवासी यशार्थदीप श्रीवास्तव उसके सहयोगी हैं। संस्थान की कोई मान्यता नहीं थी लेकिन, आरजे व एंकरिंग कोर्स के नाम पर छात्रों को धोखा देकर 1.5 लाख रुपये वसूले जा रहे थे। संचालक साईं शेखर के खिलाफ दो माह पहले बनारस में भी फर्जीवाड़े, प्लेसमेंट के नाम पर यौन शोषण के प्रयास की सिगरा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। बनारस में मामला खुलने के बाद यहां भी छात्रों ने जार्जटाउन थाने में संचालक के खिलाफ तहरीर दी। इसके बाद पुलिस जांच में जुट गई। जांच में सामने आया कि छात्र-छात्राओं से सीधे तौर पर ठगी की जा रही थी। जार्जटाउन एसओ संतोष कुमार शर्मा, चौकी प्रभारी टैगोर टाउन मनोज कुमार सिंह, विजय प्रताप, रमेश यादव, संतोष कुमार की टीम ने आरोपियों को टैगोर टाउन स्थित संस्थान से ही सोमवार को गिरफ्तार कर लिया।

छात्र-छात्राओं संग फर्जीवाड़े की खबर अमर उजाला ने प्रमुखता के साथ  09 जून के अंक में प्रकाशित की थी। इसके बाद संचालकों में हड़कंप मच गया। इसके बाद पुलिस को आरोपियों के खिलाफ एक्शन लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। एसओ के मुताबिक तीनों आरोपी बनारस में भी वांछित चल रहे थे। सिगरा थाने को इनके पकड़े जाने की सूचना दे दी गई है।
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आरजे व एंकर बनाने का सब्जबाग दिखाकर इंस्टीट्यूट संचालक छात्रों से मोटी रकम वसूलते थे। भुक्तभोगी छात्रों के मुताबिक उनसे 1.5 लाख की वसूली होती थी लेकिन, 75 हजार की रसीद दी जाती थी। रसीद में भी कोई रजिस्ट्रेशन नंबर और क्रमांक दर्ज नहीं होता था। छात्रों के मुताबिक उनको शुरुआत में बताया गया कि सभी को 10 माह की ट्रेनिंग कराई जाएगी। उसके बाद अलग-अलग स्थानों पर नौकरी दिलवाई जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टे कोर्स खत्म होने के बाद नौकरी के लिए रुपये मांगे गए। पीड़ित छात्र-छात्राओं ने बताया कि उनके साथ मान्यता के नाम पर भी फरेब हुआ। संचालकों ने द नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर इंटरप्रेन्योरशिप एंड स्मॉल बिजनेस डेवलपमेंट(निसबड) से संबद्धता की बात कही जबकि निसबड ने इससे साफ इंकार किया। उनका कहना है कि ऐसे किसी भी फाउंडेशन की उनके संस्थान से संबद्धता नहीं है। यही नहीं, कई जगहों से मिल रही शिकायतों के कारण ही अक्तूबर 2017 से ही उन्होंने अपने सभी ट्रेनिंग पार्टनर की एक्टिविटी पर रोक लगा दी है।
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