इलाहाबाद। बात घपले और घोटाले की हो तो करछना का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। पावर प्लांट के लिए अधिग्रहीत भगेसर देहली गांव की जमीन पर पहले लोहिया आवास बनवा दिए गए। अब वहां सड़क का निर्माण कराया जा रहा है जबकि अफसर यह अच्छी तरह से जानते हैं कि पावर प्लांट का निर्माण शुरू होने के बाद न तो लोहिया आवास बचेंगे और न ही लाखों रुपये की लागत से बनाई जा रही सड़क। इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) और ठेकेदार जल्दबाजी में काम पूरा करने में लगे हुए हैं ताकि ठेकेदारों को भुगतान मिल जाए और अफसरों को कमीशन।
करछना पावर प्लांट के मामले में प्रशासन अब तक सिर्फ किसानों को दोषी ठहराता आया है। इसी आधार सितंबर 2015 में कचरी के दर्जनों किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई, किसानों को जेल भेज दिया गया। साथ ही आंदोलनकारियों के मुखिया को भगौड़ा घोषित कर उन पर इनाम रख दिया गया। कचरी को अब भी फोर्स ने घेर रखा है और अधिग्रहीत जमीन पर चहारदीवारी का निर्माण हो रहा है। किसानों की आवाज दबी तो पावर प्लांट की आड़ में हो रहे घपले के विरोध में भी आवाज उठनी बंद हो गई। नतीजा कि कुछ अफसरों, उनसे मिले जनप्रतिनिधियों और ठेकेदारों के मनमुताबिक काम होने लगा। कुछ दिनों पहले इलाहाबाद आए उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत निगम के परियोजना निदेशक राकेश त्रिवेदी ने पावर प्लांट के लिए अधिग्रहीत जमीन पर बनाई जा रही चहारदीवारी की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे। निरीक्षण के दौरान उन्होंने स्थानों पर चहारदीवारी तोड़कर दोबारा निर्माण कराने के निर्देश दिए थे।
घपला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहा। यह बात सामने आ चुकी है कि पावर प्लांट के लिए अधिग्रहीत की गई भगेसर देहली गांव की जमीन पर प्रशासनिक अफसरों और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से लोहिया आवास बनवा कर करोड़ों रुपये का घपला किया गया। अब ये आवास चहारदीवारी बनाकर घेरे जा रहे हैं। यानी पावर प्लांट का निर्माण शुरू होते ही सरकारी पैसे से बने ये आवास ध्वस्त कर दिए जाएंगे। देहली भगेसर गांव का ही एक महजा है ढोलीपुर, जो अधिग्रहीत जमीन के दायरे में आता है। इस जमीन पर भी पावर प्लांट का निर्माण होना है, लेकिन इसे नजरअंदाज करते हुए पीडब्ल्यूडी ने वहां सड़क बनाने के लिए चार माह पहले टेंडर निकाल दिया। अफसरों ने जब देखा कि अचानक वहां चहारदीवारी का निर्माण शुरू करा दिया गया है तो पीडब्ल्यूडी ने जल्दबाजी में सड़क का काम शुरू करा दिया। सड़क निर्माण की गुणवत्ता बेहद घटिया बताई जा रही है। अफसर और ठेकेदार जानते हैं कि गुणवत्ता तो दूर, कुछ दिन बाद सड़क का भी नामोनिशान नहीं रह जाएगा।