दिवंगत राजू पाल के परिजनों और करीबियों का कहना है कि राजू पाल की जान पर खतरा तो उसी वक्त मंडराने लगा था जब उन्होंने अक्तूबर 2004 में शहर पश्चिमी के विधानसभा उप चुनाव में अतीक अहमद के भाई खालिद अजीम अशरफ को पराजित किया। दरअसल, पांच बार विधायक रहे अतीक अहमद 2004 में सपा के टिकट पर फूलपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए तो शहर पश्चिमी की सीट खाली हो गई। इस सीट पर उपचुनाव में इलाहाबाद के टॉप टेन अपराधियों में शुमार रहे राजू पाल ने बाहुबली अतीक के भाई अशरफ के सामने ताल ठोंक दी। सब सोच रहे थे कि अतीक के गढ़ में राजू की नहीं चलने वाली लेकिन राजू ने चार हजार से ज्यादा वोटों से अशरफ को पटकनी देकर सबको हैरान कर दिया।
इस जीत से वह विरोधी गुट की आंखों की किरकिरी बन गए। अतीक कैंप के सामने राजू की कोई बिसात थी भी नहीं। पांच बार विधायक और फिर सांसद चुने गए अतीक अहमद के खिलाफ लगभग हत्या, धमकी, अपहरण समेत 175 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। उन्हें यूपी में बाहुबली माना जाता है। जबकि राजू पाल की छवि ऐसे अपराधी की थी जो लूट-छिनैती और कत्ल करता है।
राजू के खिलाफ 25 मुकदमे थे। उनमें कत्ल के दो केस थे जबकि हत्या की कोशिश के दस मामले हैं। राजू के खिलाफ पहला मामला धूमनगंज थाने में 1992 में दर्ज हुआ था। यूं धनी और बाहुबली भाई के आगे राजू कहीं नहीं ठहरते थे लेकिन विधायकी में राजू की जीत ने विरोधी गुट को चित कर दिया। इसके बाद लगातार दो घातक हमलों से साफ हो गया कि राजू के लिए आने वाले दिन में खतरा बढ़ता जाएगा। खुद राजू ने यह खतरा भांप लिया था। उन्होंने शासन और प्रशासन के साथ ही मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से भी अतीक से जान पर भय जताते हुए सुरक्षा की बार-बार गुहार लगाई थी लेकिन उन्हें नहीं बचाया जा सका।
दिवंगत राजू पाल की पत्नी बसपा विधायक पूजा पाल का साफ कहना है कि उनके पति की जीत बाहुबली अतीक कैंप के गले नहीं उतरी। इसीलिए जीत के फौरन बाद राजू पर हमले शुरू हो गए थे। लगातार दो घातक हमले हुए लेकिन प्रशासन ने अनदेखी की। विधायक पूजा पाल कहतीं हैं कि यह सरासर सियासी कत्ल था जो अतीक और अशरफ ने अपने शूटरों से कराया था। मगर पुलिस-प्रशासन ने घटना के तीसरे रोज ही नीवां के रंजीत पाल और बमरौली के फरहान को गिरफ्तार कर इसे निजी दुश्मन करार दिया था। तत्कालीन एसएसपी सुनील गुप्ता ने कहा था कि रंजीत और फरहान ने निजी दुश्मनी का बदला लिया। फरहान के पिता अनीस का वर्ष 1999 में कत्ल हो गया था। राजू पर हत्या का आरोप लगा था। फरहान ने उस कत्ल का बदला लिया। मगर पुलिस के इस दावे को घटना में सामने आए तथ्य भी झुठलाते हैं। बाद में पुलिस ने भी अतीक-अशरफ के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।
विधायक राजू पाल की जान पर आसन्न खतरे के बारे में पुलिस को भी भनक लग गई थी। इसे यूं समझा जा सकता है कि धूमनगंज के तत्कालीन थानेदार परशुराम सिंह ने नवंबर और फिर दिसंबर में बम-गोली से हमले में बाल-बाल बचे राजू पाल को खुद चेताया था कि वह सतर्क होकर रहें और घर से कम ही निकलें। थानेदार ने विधायक को बातों में समझा दिया था कि उन्हें मारने के लिए शूटर लगे हैं। मगर राजू ने क्षेत्र में निकलना बंद नहीं किया। थानाध्यक्ष परशुराम सिंह को शायद अपने मुखबिरों से खबर मिल गई थी कि जल्द ही राजू पाल पर बड़ा जानलेवा हमला होने वाला है। इस हमले का मतलब जबरदस्त खून-खराबा। इसीलिए उन्होंने खुद हत्याकांड से तीन रोज पहले 22 जनवरी 2005 को एसएसपी से मिलकर अर्जी दी कि उनका तबादला कहीं और कर दिया जाए। मगर उनकी मांग ठुकरा दी गई। हत्याकांड में परशुराम को निलंबित किया गया था।