मृतका के माता पिता ने अपनी गवाही में बताया की साजिद की शादी भले ही उनकी बेटी से हो गई थी, लेकिन उसके दिल में कोई और लड़की बसी हुई थी, जिसको लेकर अक्सर साजिद और उनकी बेटी के बीच कहासुनी होती थी। उनकी बेटी का ससुराल और मायका आमने-सामने है। उनकी बेटी अक्सर अपनी हत्या की आशंका जताती थी।
विवेचना के दौरान एक बात स्पष्ट हुई की इस मामले में एकमात्र चश्मदीद गवाह साजिद है। हत्या के पहले और हत्या के बाद केवल साजिद की मौजूदगी साबित हो रही थी। गवाहों के बयान और साक्ष्य पर गौर करते हुए सत्र अदालत ने पाया कि साजिद ने अपनी पत्नी को गोली मारी और खुद को बचाने के लिए अज्ञात के खिलाफ लूट और हत्या का नाटक रचते हुए एफआईआर दर्ज करवाई। परिस्थितिजन्य और अंतिम दृश्य साक्ष्यों के आधार पर साजिद को तैयबा की हत्या का दोषी करार दिया।
साजिद द्वारा पत्नी की हत्या के लिए बुने इस जाल में फंसे उसके तीन दोस्त गेंदालाल, अनिल और भीम को अदालत ने बेगुनाह पाया। सात साल चले इस आपराधिक विचारण के बाद सत्र न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव में निर्दोष पाए गए गेंदालाल, भीम और अनिल को दोषमुक्त करते हुए मामले से उन्मोचित कर दिया और दोषी पाए गए साजिद को पत्नी की हत्या के लिए सश्रम आजीवन कारावास और दस हजार रुपए का अर्थ दंड सुना दिया।