बुड्ढा ताजिया की मेहंदी का जुलूस न निकलने से बृहस्पतिवार की रात सड़कों पर या अली या हुसैन की सदाएं भी नहीं गूंज सकीं। लगातार गमगीन हो रहे माहौल के बीच मेहंदी और अलम उठाने के लिए सैकड़ों युवा पहले से उत्साहित थे। लोगों को बुड्ढा ताजिया की मेहंदी उठने का बेसब्री से इंतजार था।
कर्बला के 72 शहीदों की याद में निकाले जाने वाले ऐतिहासिक बुड्ढा ताजिया के मेहंदी जुलूस की रवायत बृहस्पतिवार को टूट गई। 375 साल पुराने मेहंदी जुलूस को नहीं निकाला जा सका। अलम भी नहीं निकला। अलबत्ता इमामबाड़े में ही ताजिये को सजा दिया गया, जहां देर रात तक गमजदा लोगों ने फूल चढ़ाकर रस्म अदायगी की।
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बुड्ढा ताजिया की मेहंदी का जुलूस न निकलने से बृहस्पतिवार की रात सड़कों पर या अली या हुसैन की सदाएं भी नहीं गूंज सकीं। लगातार गमगीन हो रहे माहौल के बीच मेहंदी और अलम उठाने के लिए सैकड़ों युवा पहले से उत्साहित थे। लोगों को बुड्ढा ताजिया की मेहंदी उठने का बेसब्री से इंतजार था, लेकिन जुलूस नहीं निकला। मुतलवल्ली शमीम अहमद इमामबाड़े से घर चले गए। रात को फोन करने पर पता चला कि उनकी तबीयत नासाज है।
बुड्ढा ताजिया की मेहंदी का जुलूस न निकाले जाने की वजह बताने के लिए भी वह फोन पर नहीं आए। हालांकि देर रात तक इमामबाड़े में रखी गई बुड्ढा ताजिया की मेहंदी पर फूल चढ़ाने के लिए हुसैन के सेनानियों का सैलाब उमड़ता रहा। मेहंदी का यह जुलूस अपने परंपरागत रास्तों मरकरी चौराहा, पुरानी गुड़िया तालाब, मोती मस्जिद से वापस नुरुल्ला रोड होते हुए इमाम बाड़ा बुड्ढा ताजिया तक पहुंचता रहा है।