कोविड अंतिम संस्कार के नोडल ऑफिसर डॉ. महानंद बताते हैं कि अप्रैल और मई में ऐसे करीब तीस से ज्यादा मामले आ चुके हैं। ऐसे भी मामले हैं, जिनमें संक्रमित की मौत पर परिजनों ने घाट पर आने से ही मना कर दिया। फोन से संपर्क किया गया तो जवाब मिला कि शव जला दिया जाए। उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। डिप्टी सीएमओ राकेश पांडेय कहते हैं कि अप्रैल में इस तरह के मामले अधिक आए। उस दौरान अस्पतालों से लेकर होम आइसोलेशन में भी लोग मर रहे थे। अकेले अप्रैल में ही दो दर्जन के करीब ऐसे शव आए जिनके परिजनों ने अंतिम संस्कार की रस्म नहीं निभाई। मई में भी अब तक 15 मामले आ चुके हैं। इनमें से कई मामलों में घरवालों ने जवाब में न आने को कहा। कुछ में परिजनों ने फोन तक नहीं उठाया।
prayagraj news : दारागंज घाट पर आमतौर पर यह दृश्य देखने को नही मिलता, मंगलवार को घाट किनारे कई शवों को एक साथ अंतिम संस्कार करते दिखे लोग।
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डॉक्टर पांडेय ने बताते हैं कि मौत के बाद ऐसे लोगों का शव तीन दिन तक पोस्टमार्टम हाउस में रखा जा रहा है। तीन दिन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसकी वीडियोग्राफी कराई जा रही है। तब उसका अंतिम संस्कार कराया जा रहा है। ऐसा कोरोना की दूसरी लहर में ही नहीं, बल्कि पहली लहर में भी हुआ था। लोग अंतिम संस्कार में नहीं आना चाहते। जबकि, घाट पर मृतक का चेहरा दिखाने के साथ दाग देना, मुखाग्नि देने जैसी प्रक्रियाओं को पूरा पालन कोविड नियमों के अंतर्गत किया जा रहा है।
संक्रमण से डर बड़ी वजह
अधिकतर मामलों में परिवार वालों ने इसलिए आने से मना कर दिया क्योंकि उनको भी अपने संक्रमित होने का डर था। कोविड संक्रमितों की मौत पर उनके अंतिम संस्कार का जिम्मा नगर निगम के हवाले हैं। निगम के कर्मचारी जब परिवार वालों कोे फोन कर अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए कहते हैं तो संक्रमण का डर बताकर आने से मना दिया जाता है। नाते-रिश्तेदार तो बात भी नहीं करना चाहते।