माघ मेले के दौरान मेला क्षेत्र के आसपास लगे जाम ने अलोपीबाग निवासी फल विक्रेता दीपक सोनकर के परिवार के दो वक्त के निवाले पर संकट ला दिया। औसतन एक हजार रुपये रोज की बिक्री 200 से 300 रुपये पर आ गई। नतीजा यह हुआ कि जहां वह मेले के दौरान अच्छी आमदनी से व्यापार बढ़ाने की सोच रहा था। वहीं अब किसी तरह दो वक्त के निवाले के जुगाड़ में लगा है।
माघ मेले के दौरान बेपटरी यातायात व्यवस्था ने बिगाड़ दिया कई घरों का बजटयह कहानी महज एक दीपक की नहीं, बल्कि उसके जैसे कई उन दुकानदारों, व्यापारियों की है जो माघ मेले के दौरान मेला क्षेत्र के आसपास लगे जाम से प्रभावित हुए। जाम के चलते न सिर्फ उनका व्यापार मंदा हो गया बल्कि कई तो ऐसे भी हैं, जो नुकसान में चले गए।
प्लानिंग ही नहीं थी, जीटी जवाहर पर झोंक दिए वाहन
जीटी जवाहर चौराहे के पास श्रीराम रेस्टाेरेंट चलाने वाले अनिमेष गुप्ता की कहानी भी दीपक जैसी ही है। उन्होंने कुंभ के साथ ही कई माघ मेले देखे हैं। वह बताते हैं, जाम की जो समस्या इस बार रही, वैसी उन्हाेंने पहली बार देखी। कमोबेश हर स्नानपर्व पर हालात लगभग एक से रहे। सड़कों पर सुबह से शाम तक जाम लगा रहा। नतीजा यह हुआ कि ग्राहक आए नहीं और व्यापार को तगड़ा नुकसान हुआ।
माघ मेले में इस बार जाम की समस्या की वजह यह थी कि यातायात व्यवस्था को लेकर प्लानिंग ही नहीं दिखाई दी। वाहनों को योजना बनाकर पार्क कराने की बजाय सीधे मेला क्षेत्र के इंट्री प्वाइंट जीटी जवाहर चौराहे व हर्षवर्धन तिराहे पर झोंक दिया गया। जबकि पूर्व में ऐसा नहीं था। भीड़ ज्यादा होने पर बड़े वाहनों को अरैल, झूंसी, फाफामऊ में बनी पार्किंग में ही रोक दिया जाता था। नतीजा यह हुआ कि सुबह से लेकर शाम तक लोग जाम से ही जूझते रहे।
टेंपो-ई रिक्शा ने घेर ली सड़क, गाड़ियां कैसे चलेंगी
अलोपीबाग में ही फल का व्यापार करने वाले अनिल कुमार ने बताया कि जाम का सबसे बड़ा कारण टेंपो-ईरिक्शा रहे। बताया कि लगभग 30 साल से वह यहां दुकान चला रहे हैं। हालत यह है कि आधी से ज्यादा सड़क टेंपो-ई रिक्शा वाले घेरे रहते हैं। पुलिस से शिकायत पर कुछ मिनटों के लिए हटाए जाते हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद फिर जमा हो जाते हैं। माघ में कम से कम 15 दिन ऐसे गए जब जाम के चलते व्यापार लगभग ठप सा रहा। ग्राहक आए नहीं और बमुश्किल 100-200 रुपयों की बिक्री हुई।