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कॉफी हाउस की बतकही : अमर उजाला की पहल पर रचनाकारों ने जीवंत किया कॉफी हाउस का पुराना दौर

Sun, 09 Jul 2023 03:29 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

नामचीन रचनाकारों के बहाने उन तमाम पुरोधाओं को याद किया गया, जिन्होंने यहीं बैठकर अपने समय, समाज और साहित्य को गुना, गढ़ा और सहेजा। खूब बहसें कीं, झगड़े किए। अमर उजाला के प्रकाशन के 75 बरस पूरे होने के उपलक्ष्य पर यहां बयां हुए तमाम किस्से नई पीढ़ी के लिए एकदम नए थे और प्रेरक भी।
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अमर उजाला की ओर से कॉफी हाउस में आयोजित बतकही में मौजूद शहर के जाने माने रचनाकार। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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साहित्यिक विरासत को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से शनिवार को सिविल लाइंस स्थित कॉफी हाउस में अदबी बतकही का अड्डा जमा। नामचीन रचनाकारों के बहाने उन तमाम पुरोधाओं को याद किया गया, जिन्होंने यहीं बैठकर अपने समय, समाज और साहित्य को गुना, गढ़ा और सहेजा। खूब बहसें कीं, झगड़े किए। अमर उजाला के प्रकाशन के 75 बरस पूरे होने के उपलक्ष्य पर यहां बयां हुए तमाम किस्से नई पीढ़ी के लिए एकदम नए थे और प्रेरक भी।

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कवि-आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा, ऐसे समय में जब प्रतिपक्ष है ही नहीं, कॉफी हाउस का वह प्रतिपक्ष बहुत याद आता है, जो हमेशा बहुमत में रहा। कॉफी की चुस्कियों के बीच गंभीर और सार्थक बहसें होती थीं। वह साइकिल का युग था, लेकिन मैं पैदल आता था। एक दिन सुभाष चौक पर लक्ष्मीकांत वर्मा, सत्यप्रकाश मिश्र और सुरेश चंद्र मिश्र मिल गए।

सत्यप्रकाश जी ने टिप्पणी की, पैर से पैदल हो...दिमाग से नहीं, फिर साइकिल क्यों नहीं ले लेते? तभी लक्ष्मीकांत वर्मा बोले, यह सिर से मार्क्सवादी है और पैर से गांधीवादी। प्रो. कुमार ने एक किस्सा और सुनाया। कहा, विजय देव नारायण साही ने यहीं कहा था... सरकार चलती है अपर हाउस, लोअर हाउस और कॉफी हाउस से।

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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर श्याम किशोर सेेठ बीते दिनों को याद करके रोमांचित हो उठे। बोले, बहुत सारी विचारधाराएं यहीं से निकलीं। साहित्य, शिक्षा हो या राजनीति, सभी के प्रतिपक्ष का प्रारूप यहीं तैयार किया गया। सच तो यह है कि कॉफी हाउस में लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिपक्ष का पूर्वाभ्यास होता था।

प्रो. सेठ की पत्नी और एसएस खन्ना गर्ल्स डिग्री कॉलेज की पूर्व प्राचार्य आशा सेठ बोल पड़ीं...शादी के बाद बाहर निकलने के नाम पर सेठ साहब पहली बार यहीं लेकर आए थे। लेकिन, वेटर को टिप देने के लिए फुटकर कराने बाहर निकले तो मुझे साथ ले जाना भूलकर घर पहुंच गए। फिर, मैं किसी तरह घर पहुंची।

पिता गोपीकृष्ण गोपेश की अंगुलियां पकड़कर कॉफी हाउस आती रहीं कथाकार प्रो. अनिता गोपेश बोलीं, साहित्य के पुरोधाओं से यहीं रचना का संस्कार सीखा। असहमति को भी सम्मान और स्वीकृति देने का मंत्र यहीं पाया। पैलेस में नाटकों के मंचन के बाद पहली समीक्षा और नाटक को बेहतर बनाने पर यहीं चर्चा होती भी।

कवि-पत्रकार अजामिल ने कहा, यहां अपने पुरोधाओं के अनुसरण से रचना का संस्कार मिला। कॉफी हाउस के परिवेश ने नई पीढ़ी को शिक्षित-संस्कारित भी किया। यहां लोग वैचारिक दृष्टि से भले ही अलग रहे हों, लेकिन कोई खेमेबाजी नहीं, सभी एक दूसरे के संग बैठते और सहमतियों-असहमतियों को साझा करते थे। यहीं के बहस-मुबाहिसे के बीच बहुत कुछ ऐसा भी निकला, जिसने साहित्य, राजनीति को सजग-सतर्क किया, ऊर्जावान बनाया।

संस्कृतिकर्मी अभय अवस्थी बोले, कॉफी हाउस बतकही ही नहीं विचार, बवाल, बवंडर का भी अड्डा रहा है। लोहिया कहते थे, यहां की कॉफी की भाप से बवाल खड़ा होता है। वह राष्ट्रीय मंचों से पहले यहां अपनी भड़ास निकाल देते थे। वो दौर ऐसा था कि घरों में आमलेट नहीं बनता था। ठेले लगते नहीं थे। सो, तब के प्रगतिशील लोग यहीं आमलेट खाने आते थे। यह इलाहाबादी बकैती, खोचड़ई का भी अड्डा है। यहां लोग किसी को छेड़ने और खुद को छेड़वाने भी आते थे।। हां, यहां का सिस्टम हमेशा स्वअनुशासित रहा।

कुमुदिनी पति ने जोड़ा, पिता प्रोफेसर टी. पति तो नियमित रूप से यहां आतेे रहे। कभी घर पर नाश्ता नहीं किया। कॉफी हाउस से निकलकर चार-पांच बजे तक घर पहुंचते और मां खाने पर इंतजार करती रहतीं। कुछ समय बाद तकरीबन हर रविवार दक्षिण भारतीय व्यंजनों का लुत्फ लेने के लिए पूरा परिवार यहीं आने लगा। यहां अनेक महान हस्तियों को देखा-सुना। एक बार पिताजी बातों में इतना मशगूल हुए कि कॉफी हाऊस से बाहर निकले और मां को यहीं छोड़ गए। घर पहुंचे तो याद आया कि क्या खता कर आए हैं।

अरविंद बिंदु ने अपने पिता और दिग्गज कथाकार अमरकांत से जुड़े कई किस्से सुनाए। कहा, पिता के साथ यहीं भैरव प्रसाद गुप्त सहित अनेक नामचीन रचनाकारों से मिला। रंगनिर्देशक और विश्वंभर नाथ मानव जी की बेटी सुषमा शर्मा की स्मृतियां भी ताजा हो उठीं। पिताजी दाहिने कोने वाली आखिरी सीट पर बैठा करते थे। यहां खूब लड़ाइयां देखीं। कई बार ऐसा लगा कि आज खून-खराबा होकर रहेगा, लेकिन कुछ ही देर में सब सामान्य हो जाता। शुरू में हैरान होती थी कि आखिर कैसे लोग हैं, इतना लड़ते हैं और फिर कुछ देर बाद एक हो जाते हैं। शायद यही कॉफी हाउस की बहसों की खूबी थी।

बतकही के संचालक गीतकार यश मालवीय ने भी कॉफी हाउस के रोचक किस्से सुनाए। कहा, हम चले हुए रास्तों पर फिर चले लेकिन, इन रास्तों के आशीष ने ही राह दिखाई। कॉफी हाउस में बहसों के बीच कई बार किसी ने कुछ नहीं सुना, तल्ख टिप्पणी तक की, लेकिन लोग अपनी बात कहते हुए समय के शिलापट पर हस्ताक्षर करते रहे। वस्तुत: कॉफी हाउस ने ही असहमतियों को सम्मान देने का संस्कार सिखाया।

जो बने आयोजन के साक्षी

सरस्वती पत्रिका परिवार से रविनंदन सिंह व अनुपम परिहार, राजकमल प्रकाशन के निदेशक आमोद माहेश्वरी, इंडियन प्रेस के अरिंदम घोष, कहकशां के आनंद कक्कड़, अश्क परिवार के प्रतिनिधि श्वेताभ अश्क, कथाकार असरार गांधी, इविवि के अंग्रेजी विभाग के पूर्व प्रो. हेमेंद्र शंकर सक्सेना, प्रो. हेरंब चतुर्वेदी, डॉ. सूर्यनारायण, डॉ. धनंजय चोपड़ा, डॉ. श्लेष गौतम, हितेश कुमार सिंह, डॉ. अशोक कुमार शुक्ला, विनय श्रीवास्तव, लखनऊ विवि से डॉ. फाजिल हाशमी, गौरी सक्सेना, केके श्रीवास्तव, अजीत श्रीवास्तव, संजय तिवारी, हसीब अहमद आदि विशिष्टजन मौजूद थे।

...और होने लगी महिलाओं की इंट्री
कॉफी हाउस में महिलाएं पहले परिवार कक्ष में ही बैठा करती थीं। बाद में, साही जी की पत्नी डॉ. कंचन लता साही, दूधनाथ सिंह जी की पत्नी निर्मला ठाकुर और केशवचंद्र वर्मा की पत्नी सरोजिनी वर्मा आदि मुख्य कक्ष में ही न सिर्फ बैठने लगीं, बल्कि गंभीर बहसों का हिस्सा भी बनीं।

अनकहे किस्से...

कॉफी हाउस से निकलते समय अश्क जी को जब विद्यार्थियों ने घेर कर ऑटोग्राफ मांगा तो उन्होंने लिखा-पुस्तकें खरीदकर पढ़ें। विद्यार्थियों ने वही कागज धर्मवीर भारती जी की ओर बढ़ा दिया, जिस पर उन्होंने लिख दिया-पुस्तकें मिलने का पता-नीलाभ प्रकाशन।

इलाचंद जोशी ने ‘जहाज का पंछी’ पर मिली रॉयल्टी की आधी रकम जमा करा दी थी, जिससे साहित्यिक मित्रों ने पूरे सप्ताह कॉफी पी।
पंडित नेहरू के निधन के बाद हुए फूलपुर उपचुनाव के दौरान जब आचार्य जेबी कृपलानी प्रत्याशी सालिकराम जायसवाल के पक्ष में प्रचार करने आए तो कॉफी हाउस में आना नहीं भूले।

इंदिरा गांधी के खिलाफ हाईकोर्ट में मुकदमा जीतने के बाद राजनारायण ने सभी समर्थकों को यहीं पर कॉफी की दावत दी थी।
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फैसले जो यादगार हो गए

कॉफी हाउस में ही प्रगतिशील लेखक संघ की समानांतर संस्था परिमल का संविधान तैयार किया गया था।

लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय ने हिंदी साहित्य का इतिहास का किस्तवार पाठ यहीं पूरा किया था।
कॉफी हाउस में ही उपेंद्रनाथ अश्क ने परचून की दुकान खोलने का निर्णय लिया था तो धर्मवीर भारती और लक्ष्मीकांत वर्मा ने यहीं निकष पत्रिका की योजना बनाई।
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