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अंतिम संस्कार में भी लगा दिए दो दिन ‘जाने वाले’ को कोई नहीं रोक पाया मगर

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फतेहगंज पश्चिमी। सरकारी सिस्टम खैर सुनता तो किसी की नहीं है लेकिन माधौपुर गांव के हजारी लाल शुक्रवार को परलोक गमन के बाद भी सिस्टम की बखिया उधेड़ गए। 36 घंटे से ज्यादा समय तक उनका शव इसलिए घर पर रखा रहा क्योंकि श्मशान भूमि में बरसात का इतना पानी भर गया था जिसकी वजह से वहां अंत्येष्टि करना ही मुमकिन नहीं रह गया था। बारिश थमने और श्मशान भूमि में भरे पानी के सूखने के लंबे इंतजार के बीच बातें शुरू हुईं तो ग्राम पंचायत, ब्लॉक और फिर सरकार तक पहुंच गईं। शनिवार शाम हजारी लाल की अंत्येष्टि के बाद यह सिलसिला खत्म हो पाया।
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हजारी लाल की उम्र 48 की थी। शुक्रवार सुबह रोज की तरह उनके सोकर न उठने पर घरवालों को ध्यान गया तो पता चला कि अचानक ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया है। घर में रोना-पीटना शुरू हो गया। बारिश के बावजूद गांव भर के लोग इकट्ठे हो गए। अंतिम संस्कार की तैयारी भी पूरी कर ली गई लेकिन एकाएक सारी तैयारी रोकनी पड़ीं। पता चला कि बारिश की वजह से श्मशान भूमि पर इतना ज्यादा पानी भर गया है कि वहां अंतिम संस्कार करना मुमकिन नहीं है। इसके बाद इंतजार शुरू हो गया कि बारिश थमे और श्मशान भूमि पर भरा पानी सूखे तो हजारीलाल का अंतिम संस्कार किया जाए लेकिन बारिश खत्म होने के बाद भी श्मशान भूमि पर पानी भरा रहा और शाम हो गई। घरवालों के रोते-रोते आंसू भी सूख गए।
हजारी लाल के परिवार के साथ गांव के लोग भी अजब कशमकश में फंस गए। दिक्कत की बात यह भी थी कि श्मशान भूमि पर ऐसी कोई छत या टिनशेड वाली जगह नहीं थी जिसके नीचे अंतिम संस्कार करने की सुविधा हो। लंबे इंतजार के बीच सिस्टम निशाने पर आ गया। सपा सरकार की कब्रिस्तानों के पुनरुद्धार की योजना से शुरू हुई यह चर्चा श्मशान घाटों की अनदेखी तक पहुंची और फिर रुक-रुककर तब तक जारी रही जब तक श्मशान भूमि पर हालात हजारी लाल का अंतिम संस्कार करने लायक नहीं हो गए। शनिवार शाम 36 घंटे बाद बमुश्किल श्मशान भूमि पर जमीन का सूखा टुकड़ा तलाश कर हजारी लाल का अंतिम संस्कार किया गया। अंत्येष्टि के बाद घुटनों तक कीचड़ में अटकर लोग घर लौटे.
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अफसरों ने सुन ली होती तो नहीं आती ये नौबत
माधौपुर गांव वैसे भी पिछड़ा हुआ गांव है। सड़कें काफी बुरी हालत में हैं। श्मशान भूमि को पक्का कराकर वहां एक शवदाह गृह बनवाने के लिए भी लोग कई बार अफसरों से फरियाद लगा चुके हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। गांव के राज राजपूत ने बताया कि बरसात के महीनों में हालात काफी खराब रहते हैं। उस दौरान गांव में कोई भी निधन होने पर ऐसी ही समस्या सामने आती है। गांव वालों का यह भी कहना था कि अगर एक साल पहले उनकी मांग पर जिम्मेदारों ने गंभीरता से विचार कर लिया होता तो शायद ये नौबत नहीं आती।
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