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जेल की दीवारों में बाल अधिकारों को कैद नहीं किया जा सकता : हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जेल में कैदियों संग रह रहे उनके बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए विस्तृत दिशा निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि जेल की दीवारों में बाल अधिकारों को कैद नहीं किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत ने गाजियाबाद जेल में बंद हत्यारोपी रेखा की जमानत याचिका खारिज करते हुए दिया है।
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अधिवक्ता ने याची के पांच वर्षीय बच्चे की देखभाल का हवाला देकर हाईकोर्ट से जमानत की मांग की थी। हवाला दिया कि जेल में संग रह रहे हत्यारोपी के बच्चे की शिक्षा और सर्वांगीण विकास में बाधा उत्पन्न हो रही है, जो बाल अधिकार और शिक्षा के अधिकारों का हनन है। जेल का जीवन बच्चे के मन मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा।
वहीं, सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि सरकार कैदियों के बच्चों के लिए समुचित सहायता प्रणाली तैयार कर रही है। इस पर हाईकोर्ट ने दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा कि अदालतें माता-पिता के कारावास के परिणामस्वरूप आश्रित बच्चों को होने वाली क्षति के प्रति अपनी आंखें बंद नहीं कर सकतीं।
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कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह ऐसे बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, तंदुरुस्ती और समग्र विकास के बारे में ठोस कार्यक्रम बनाए ताकि उन्हें जेल के किसी भी नकारात्मक प्रभाव से बचाया जा सके। इसके लिए उन्हें जेल से अलग क्षेत्र में रखा जाना चाहिए। साथ ही

जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि जैसे ही बच्चे को आरोपी माता-पिता के साथ जेल में लाया जाए, बाल कल्याण समिति के साथ संवाद सुनिश्चित किया जाए। यह निर्देश दिया गया कि बच्चे को माता-पिता के साथ रखने की जगह और अन्य कैदियों के बीच बैरिकेडिंग होनी चाहिए ताकि कैदियों और बच्चे के बीच संपर्क से बचा जा सके।

यह भी निर्देश दिया कि बच्चे को प्री स्कूल/किंडरगार्टन/प्लेस्कूल/प्राइमरी स्कूल में भेजा जाए, जो जेल परिसर के आसपास स्थित हो। जेल अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे खेल के मैदान, क्रेच और अन्य क्षेत्र उपलब्ध कराएं जो बच्चे के रचनात्मक विकास में मदद कर सके।

कोर्ट ने बच्चों के शारीरिक, रचनात्मक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास के लिए निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को आवश्यकता पड़ने पर गतिविधियों और सहायता प्रणालियों की सूची बढ़ाने की छूट है।
कानून, जेल, शिक्षा, चिकित्सा और स्वास्थ्य मंत्रालयों/विभागों और राज्य के किसी भी अन्य विभाग सहित अन्य मंत्रालय और प्राधिकरण, जहां भी आवश्यक हो, महिला और बाल विकास विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार के साथ पूर्ण सहयोग करेंगे। न्यायालय ने कहा कि विभागों के बीच समन्वय और सहयोग की कमी कानून के कार्यान्वयन में भी बाधक हैं।
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