समाजशास्त्री इसे जातियों का विखंडन कहें या फिर बेरोजगारी की मजबूरी, सच्चाई यही है कि विभिन्न प्रकार के व्यवसायों को लेकर जातीयता की हदबंदी टूट रही है। नगर निगम में संविदा सफाई कर्मचारियों के पदों पर तमाम ऐसी जातियों के युवाओं का आवेदन करना, जो आमतौर पर अब तक इससे दूर ही रहा करते थे, यही साबित करता है। एक अदद नौकरी के लिए अगड़ी कहलाने वाली जातियों के युवा भी इस पेशे में आने को तैयार हैं। इसमें मुस्लिम बिरादरी की उच्च जाति के भी युवा शामिल हैं। तभी तो नगर निगम में संविदा सफाई कर्मियों की भर्ती में बड़ी संख्या में सवर्ण जाति के युवाओं ने भी आवेदन किए हैं। इस नियुक्ति में लिखित परीक्षा नहीं होनी है। मौके पर नालों की सफाई के बाद साक्षात्कार और उसके बाद भर्ती हो जानी है, सो सवर्ण जाति के युवा भी फावड़ा, तसला उठाकर नालों की सफाई में जुटे हैं।
बेरोजगारी का दंश झेल रहे युवा एक नौकरी पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। फिर यह मायने नहीं रखता कि काम क्या करना है। तभी तो नगर निगम में संविदा पर सफाई कर्मियों की भर्ती के लिए बीटेक, बीएड, एमएससी, बीएससी, बीए जैसी डिग्री के साथ तमाम ट्रेड में डिप्लोमा करने वाले युवाओं ने आवेदन किया। हालांकि रेलवे भर्ती में अक्सर ऐसा होता है जबकि गैंगमैन, लाइन मैने जैसे पदों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त युवा आवेदन करते हैं। बेरोजगारी के इस आलम में स्थिति ऐसी बदली है कि सफाई कर्मी के लिए सवर्ण जाति के 6568 युवाओं ने भी आवेदन किया है। नगर निगम की ओर से तैयार की गई सूची में ब्राह्मण, कायस्थ, ठाकुर, बनिया जाति के 4423 आवेदन शामिल हैं, जबकि 2145 युवा मुस्लिम समुदाय के सवर्ण जातियों से हैं। समाजशास्त्री बद्री नारायण कहते भी हैं कि कास्ट सिस्टम तोड़ने के लिए यह अच्छा संकेत है।
‘सफाई कर्मचारी की नौकरी में सवर्ण जाति के युवाओं का आना विसंस्कृतिकरण की निशानी है। जाति के आधार पर काम तय होने की परंपरा और व्यवस्था अब खत्म हो रही है। बेरोजगारी भी बड़ा कारण है। यह विभिन्न जातियों को मिलने वाले आरक्षण पर भी प्रश्न खड़ा करता है। ऐसी स्थिति में जाति के बजाए वर्ग के आधार पर आरक्षण होना चाहिए।’ प्रो.आशीष सक्सेना, अध्यक्ष सामाजशास्त्र विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
‘किसी भी काम को नौकरी में तब्दील किए जाने से उसके पीछे बेरोजगारों की कतार लग जा रही है। सफाई कर्मी के लिए सवर्णों का आवेदन करना भी इसका उदाहरण है। कास्ट सिस्टम तोड़ने के लिए यह अच्छा संकेत है लेकिन वर्तमान परिदृश्य में इस नौकरी में दलितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।’ प्रो. बद्री नारायण, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान
‘ऐसे लोग नियुक्ति के बाद खुद साफ-सफाई करने से बचते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों आदि में ऐसा ही हो रहा है, जहां साफ-सफाई के लिए नियुक्त तो सवर्ण जाति के लोग हैं लेकिन उन्होंने किराए पर आदमी रखे हैं, जो मुख्य रूप से सफाई का ही काम करते हैं। बदले में उन्हें कुछ रकम दे दी जाती है। सफाई जैसा काम जिस वर्ग के लिए है, उसे ही करना चाहिए।’ रामबृज गौतम, दलित नेता
50 फीसदी सीटों में तय होगी सामान्य जाति की मेरिट
इलाहाबाद। संविदा सफाई भर्ती में भी आरक्षण का पालन किया जा रहा है। नगर निगम के प्रभारी अधिकारी अधिष्ठान पीके मिश्र के मुताबिक महिला समेत ओबीसी, एससी और एसटी के लिए 50 फीसदी सीटें तय हैं। शेष 50 फीसदी सीटों में सामान्य जाति की मेरिट बनेगी।
हर माह मिलेगी 14500 रुपये पगार
संविदा पर काम करने वाले सफाई कर्मचारियों को हर माह करीब 14500 रुपये पगार मिलेगी। नौकरी पाने के लिए एक लाख सात हजार 465 युवाओं ने आवेदन किया है। इसमें सामान्य जाति के 6568, ओबीसी के 54935, एससी के 44901 और एसटी श्रेणी के 1039 युवा शामिल हैं। 22 ऐसे युवा भी हैं जिन्होंने जाति का उल्लेख नहीं किया है। इनमें से मात्र 916 को ही नौकरी मिलनी है।