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दफनाए अकीदत के फूल, गमे हुसैन में डूबी फिज़ा

Sun, 25 Oct 2015 12:07 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद। अबकी दशहरा और मुहर्रम की तारीखें आगे-पीछे पड़ने के कारण तमाम ताजियादारों की ओर से ताजिया, मेहंदी, झूला आदि के जुलूस न निकाले जाने से शनिवार को दसवीं मुहर्रम भी अदीकत और सादगी से मनाया गया। वैसे पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों की करबला में शहादत की याद में शहर के तमाम मुस्लिम इलाके गमे हुसैन में डूबे रहे।
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गली-गली में ‘या अली-या हुसैन’ की सदाएं गूंजीं।
ऐतिहासिक मुहर्रम कमेटी के मुताबिक तकरीबन 28 मोहल्लों के ताजियादारों की ओर से चार ताजिया, तीन झूला के अतिरिक्त अलम के 26 और मेहंदी के 31 जुलूस भले ही नहीं निकले लेकिन इमामबाड़ों पर ताजियों को रखकर नियाज फातिहा के बाद दसवीं मुहर्रम को अकीदत के फूलों को ले जाकर करबला में दफनाया गया। सुबह से ही शुरू हुई यह सिलसिला शाम तक जारी रहा। इमामबारगाह से लेकर करबला तक पूरा माहौल गमगीन रहा। करबला से अकीदतमंद शहीदे आजम के सब्र और इंसानियत के सबक का पैगाम वापस हुए।

रवायतन बुड्ढा ताजिया के फूल पहले करबला पहुंचे। अध्यक्ष मोहम्मद यासीन की सरपरस्ती में अकीदत के फूलों को गाड़ी पर रखकर नूरउल्लाह रोड, खुल्दाबाद चौराहा, हिम्मतगंज होकर करबला ले जाया गया।  वहीं बड़ा ताजिया से भी दोपहर बाद अध्यक्ष रेहान खां की सरपरस्ती में अकीदत के फूलों को एक गाड़ी पर रखकर कदीमी रास्तों जानसेनगंज, घंटाघर, ठठेरी बाजार, कोतवाली, नखासकोहना, सेवइंमंडी नखासकोहना खुल्दाबाद, हिम्मतगंज होते हुए करबला ले जाया गया, जहां उन्हें नम आंखों से दफनाया गया। नियाज, फातिहा के बाद करबला का पैगाम लेकर लौटे।
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अकीदतमंदों के हुजूम की अगुवाई महापौर अभिलाषा गुप्ता ने किया। जुलूस में सचिव इमरान खान,  पूर्व विधायक खालिद अजीम अशरफ, कुसुमलता पार्षद, अनिल कुमार गुप्ता ‘अन्नू भइया’, सरदार अजीत सिंह, मोहम्मद कादिर भाई, विजय अरोरा, परवेज अंसारी, वजीर खां, अनीस पार्षद, संजय भाई, नफीस अहमद, फरहत खान, वसीम खान, आमिर खान,सुहैल खान, शहबान अहमद आदि शामिल थे।

इलाहाबाद मोहर्रम झूला कमेटी के संयोजक गुलाम रसूल की सरपरस्ती में गुलाम नबी, सलीम पहलवान, गुलाम मोहम्मद, गुफरान अहमद गुल्लू, सऊद अख्तर अंसारी, शान मास्टर आदि की ओर से मासूम अली असगर के झूले के फूल को भी करबला ले जाकर दफनाया गया। पूरे दिन जानसेनगंज से लेकर करबला तक अकीदतमंदों का तांता लगा रहा। तमाम युवाओं ने सिर पर हरी और लाल पट्टियां बांध कर या अली, या हुसैन के साथ गमे हुसैन की यादें ताजा कीं।

पूरे रास्ते हुसैन के शैदाइयों का जोश कहीं से कम नहीं रहा। जिन रास्तों से अकीदत के फूलों को ले जाया गया, उनके दोनों ओर के मकानों के बारजों से महिलाओं और बच्चों ने जियारत की। शहादत के मौके पर असरार अहमद नियाजी,  नदीम शिराजी, डॉ.मोहम्मद असलम, मोहम्मद हफीज खां, मजहरुल हक,मोहम्मद यासीन बब्बू, निसार खां, मोहम्मद हामिद गुड्डा, गुलजार अहमद, जुल्फिकार खां जुल्लू सहित तमाम अकीदतमंद मौजूद थे।
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