इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरफेसी एक्ट की धारा-14 के तहत बंधक संपत्ति का कब्जा लेने की कार्रवाई से पहले कर्जदार को नोटिस देकर सुनवाई का अवसर देना जरूरी नहीं है। यह प्रावधान डीएम या मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट की भूमिका न्यायिक विवाद तय करने का नहीं, बल्कि आवेदन में दी गई जानकारी की सत्यता की जांच कर आवश्यक आदेश पारित करने तक सीमित है।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया, न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने आजमगढ़ निवासी सच्चिदानंद यादव व अन्य की याचिका खारिज कर दी। याचियों ने अपर जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 28 फरवरी को सरफेसी एक्ट की धारा-14 के तहत पारित आदेश को चुनौती दी थी। उनका दावा था कि आदेश पारित करने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।
इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। फाइनेंसर संस्था आधार हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड की ओर से दलील दी गई कि धारा-14 की कार्यवाही में कर्जदार को पूर्व सूचना या सुनवाई देना कानूनन आवश्यक नहीं है। इसके समर्थन में हाईकोर्ट के बैंक ऑफ बड़ौदा के फैसले का हवाला दिया।
कोर्ट ने कहा कि धारा-14 के तहत मजिस्ट्रेट का काम लेनदार की ओर से दिए गए हलफनामे और सूचनाओं की वैधानिकता व शुद्धता की जांच कर कब्जा दिलाने की प्रक्रिया में सहायता करना है। यह कोई विवाद तय करने वाली कार्यवाही नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में याची कर्जदार थे, किरायेदार या तीसरे पक्ष के कब्जेदार नहीं। इसलिए उन्हें धारा-14 की कार्रवाई से पहले सुनवाई का अधिकार नहीं है। इस आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
सरफेसी एक्ट
यह कानून बैंकों को बिना अदालत गए डिफॉल्टर की गिरवी रखी संपत्ति को जब्त करने और उसे बेचने (नीलाम करने) का अधिकार देता है।