बोर्ड परीक्षाओं और सिविल सेवा समेत अन्य भर्तियों के परिणाम ने इलाहाबाद की पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है। एक समय था जब इन परीक्षाओं में संगम नगरी के मेधावियों पर पूरे देश की नजर होती थी, लेकिन अब हर तरफ निराशा है। सीआईएससीई, सीबीएसई और यूपी बोर्ड परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट से यहां के विद्यार्थियों का नाम गायब है तो सिविल सेवा-2015 के अंतिम परिणाम में भी इलाहाबाद की झोली खाली रही। जो सफल हुए उन्होंने भी कहीं और रहकर पढ़ाई की है। संभवत: अब तक का यह सबसे खराब परिणाम है।
विशेषज्ञ इसके लिए प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय स्तर की पढ़ाई में आई गिरावट को मुख्य वजह मान रहे हैं। उनका साफ कहना है कि स्कूल-कालेजों में न पढ़ाई हो रही है और न ही प्रतियोगी परीक्षाओं वाला पुराना माहौल है। विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा प्रारूप में लगातार बदलाव हो रहे हैं। इस बदलाव को शिक्षक और प्रतियोगी पढ़ नहीं पा रहे। कोचिंग संस्थानों में भी पढ़ाई अनट्रेंड लोगों के हाथ में है। इसके अलावा हर भर्ती में गड़बड़ी, उसे लेकर नेतागिरी तथा आंदोलनों ने गंभीर प्रतियोगियों के भरोसे को और तोड़ दिया है। यही वजह है कि इलाहाबाद और आसपास के जिलों के गंभीर प्रतियोगी अब दिल्ली तथा दूसरे सेंटर्स की तरफ रुख कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एमपी दुबे का कहना है कि बेसिक से लेकर उच्च शिक्षा का स्तर गिरा है। हाईस्कूल एवं इंटर की पढ़ाई कोचिंग के भरोसे और कोचिंग में प्रशिक्षित लोग नहीं हैं। कोचिंग धंधा बन गया है। कोचिंग वाले युवाओं को गुमराह कर रहे हैं। सिविल सेवा, पीसीएस की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के केंद्र में इलाहाबाद विश्वविद्यालय और इसके हॉस्टल होते थे। हॉस्टल से ही आईएएस निकलते थे, लेकिन अब विश्वविद्यालय का स्तर काफी गिर गया है। विश्वविद्यालय शोधार्थियाें के भरोसे हैं।
जो अच्छे शिक्षक हैं वह भी पढ़ाना नहीं चाहते। हॉस्टल में अराजकता है। ऐसे में अच्छे छात्र भी बाहर चले जा रहे हैं। राजकीय डिग्री कालेज सैदाबाद के डॉ.एके वर्मा का कहना है कि प्राइमरी सेमाध्यमिक तक की पढ़ाई का स्तर गिरा है। शिक्षकों में पढ़ाने को लेकर प्रतिबद्धता नहीं दिख रही। पुराने शिक्षक परीक्षा प्रारूप में बदलाव के अनुरूप भी खुद को तैयार नहीं कर पा रहे। इसकी वजह से छात्र-छात्राओं का बेस ही गड़बड़ हो गया है। इसके अलावा छात्रनेताओं ने इलाहाबाद का माहौल खराब कर दिया है। छात्र-छात्राओं में भटकाव दिख रहा है। ऐसे में जो अच्छे हैं वे पलायन कर रहे हैं।
छात्र, अभिभावक और शिक्षक तीनों के स्तर पर समन्वय की जरूरत है। काउंसलर डॉ.अतुल मिश्रा का कहना है कि सिविल सेवा में अब सिर्फ जानकारी की परख नहीं हो रही। अभ्यर्थी की मूल सोच को परखा जा रहा है। इसके विपरीत यहां पर प्रतियोगी अब भी सिर्फ विषय पर कांस्ट्रेट कर रहे हैं। कोचिंग संस्थान भी एक सेट फार्मेट में पढ़ा रहे हैं। साथ में नोट्स उपलब्ध करा दे रहे हैं। छात्र साहित्य तथा अन्य विषयों का अध्ययन नहीं करते। लिखने का अभ्यास भी नहीं करते। इसे स्वीकार करना होगा कि अध्ययन तथा अभ्यास की कमी की वजह से यहां के प्रतियोगी हिन्दी में अपनी बात को प्रभावी ढंग से नहीं रख पा रहे। सिविल सेवा का जो नया प्रारूप है उसके अनुरूप स्कूलों में भी सोच विकसित नहीं की जा रही। सफलता के लिए समग्र रूप से विचार करने की जरूरत है।
बोर्ड परीक्षाओं के अलावा सिविल सेवा भर्ती में इलाहाबाद के मेधावियों का दबदबा हुआ करता था। इस वजह से इलाहाबाद विश्वविद्यालय को आईएएस मशीन का दर्जा प्राप्त था। इस समय ज्यादातर शीर्ष पदों पर इलाहाबाद में रहकर तैयारी करने वाले सिविल सेवक काबिज हैं। 2008 में भी यहां के 76 प्रतियोगियों ने सिविल सेवा में सफलता हासिल की थी, लेकिन इलाहाबाद से यह दर्जा छिनता दिख रहा है।
सिविल सेवा में यहां के प्रतियोगियों के सफलता का ग्राफ लगातार गिरता गया। सिविल सेवा-2015 में तो चयनितों की सूची ना के बराबर है। एक दशक पहले यहां के पीयूष श्रीवास्तव ने सीआईएससीई की बारहवीं की परीक्षा में टॉप किया था। पीयूष ने आईआईटीज में दाखिला के लिए हुई प्रवेश परीक्षा में भी पूरे देश में प्रथम स्थान हासिल किया, लेकिन उसके बाद से सभी बोर्ड परीक्षाओं की मेरिट से यहां के विद्यार्थियों के नाम गायब हैं।
विगत तीन वर्षों से इलाहाबाद में आंदोलनों का दौर लगातार जारी है। पहले सीसैट और फिर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भर्तियों में त्रिस्तरीय आरक्षण तथा भर्तियों में गड़बड़ी के खिलाफ प्रतियोगी छात्र-छात्राओं का हुजूम सड़क पर उतरा। अन्य भर्ती संस्थाओं की भर्तियों में व्याप्त गड़बड़ी के खिलाफ भी लगातार आंदोलन चला। यह क्रम अब भी जारी है। इन आंदोलनों में गंभीर प्रतियोगी शामिल हुए। इसकी वजह से उनकी तैयारी तो प्रभावित हुई ही, शहर का माहौल भी बिगड़ गया है। साथ में सिस्टम पर से उनका भरोसा भी टूट गया है। सिविल सेवा तथा अन्य भर्ती परीक्षाआें में असफलता के पीछे इसे भी मुख्य वजह माना जा रहा है।