याचियों की ओर से अधिवक्ता राम कौशिक और नोएडा प्राधिकरण के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता संजीव सेन और राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता पीके गिरी ने बहस की। याचियों का कहना था कि मनोरमा के पति जेबी कुच्छल ने अधिग्रहण प्रक्रिया को 1990 में ही चुनौती दी थी। उनकी याचिका पैरवी के अभाव में खारिज हो गई थी। इस दौरान 1999 में प्राधिकरण ने भूमि अधिग्रहीत कर ली, लेकिन 2007 में रिकॉल प्रार्थना पत्र के जरिए याचिका पुनर्जीवित होने के बाद स्वीकृत हुई।
नोटिफिकेशन रद्द करने के साथ ही कोर्ट ने प्राधिकरण को उचित मुआवजा देने को आदेश दिया था। याचियों का आरोप था कि प्राधिकरण ने कोर्ट के आदेश का अनुपालन नहीं किया। इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर अवमानना कर कार्यवाही की जाए। प्राधिकरण की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामा के आलोक में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने वर्ष 2017 से लंबित अवमानना याचिका को निरस्त कर दिया। इससे नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों को अवमानना वाद से मुक्ति भी मिल गई है।