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बेंच मुद्दे पर दोनों ओर बंट रही आश्वासन की रेवड़ी

Mon, 13 Jun 2016 01:39 AM IST
योगेंद्र मिश्र , अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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भाजपा राष्ट्रीय कार्यकार‌िणी की बैठक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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हाईकोर्ट की बेंच पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बनाने का मुद्दा दशकों से सियासी दलों के लिए एक राजनीतिक मुद्दा भर है। पार्टियां इसका इस्तेमाल महज क्षेत्रीय संतुलन साध कर वोट बैंक पक्का करने के लिए ही करती रही हैं। शायद यही वजह है कि पिछले 50 वर्षों से बेंच का मुद्दा जहां के तहां है और पार्टियां मौका और सुविधा देखकर बेंच के गठन और विरोध में बयान देती रही हैं।
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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के बयान को भी कुछ इसी नजरिए से देखा जा रहा है। पश्चिम के वकीलों से मुलाकात में संभवत: उन्होंने बेंच के समर्थन में बयान दे दिया, क्योंकि वोट बैंक के लिहाज से बेंच का मुद्दा पश्चिम में अहम है। मगर जब हाईकोर्ट के वकीलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक असफल कर देने की चेतावनी दे डाली तो तत्काल बयान का खंडन भी कर दिया गया ताकि कार्यसमिति की बैठक निर्विघ्न संपन्न हो सके। शायद यही वजह है प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य जब हाईकोर्ट में स्पष्टीकरण देने पहुंचे तो उन्होंने पश्चिमी यूपी में बेंच को लेकर पार्टी के नजरिए पर कुछ नहीं कहा, वह सिर्फ बयान को नकार कर अपना पल्ला झाड़ते दिखे।

बेंच के राजनीतिकरण को इस बात से भी समझा जा सकता है कि भाजपा जैसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी भी इस पर एकमत नहीं है। स्थानीय सांसद और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य ने ही 2015 में इस मुद्दे पर हाईकोर्ट में हुई लंबी हड़ताल के दौरान न सिर्फ हाईकोर्ट के वकीलों का समर्थन किया था बल्कि बेंच विभाजन के विरोध में 40 से अधिक सांसद के हस्ताक्षर कराकर प्रधानमंत्री को सौंपा था। जबकि उन्हीं के पार्टी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने पश्चिमी बेंच के समर्थन में बयान देकर तूफान खड़ा करवा दिया था। जाहिर है कि पार्टियां दोनों ओर आश्वासन की रेवड़ी बांट कर अपना उल्लू सीधा करने में ही यकीन रखती हैं।
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हाईकोर्ट की एक और खंडपीठ बनाने का मुद़्दा राजनीतिक से कहीं ज्यादा संवैधानिक है। जानकार मानते हैं इसका समाधान भी संवैधानिक तरीके से ही हो सकता है। बेंच के गठन के समर्थन में अब तक जो सबसे बड़ी दलील दी जाती रही है वह पश्चिम के जिलों से इलाहाबाद की दूरी है। जसवंत आयोग की रिपोर्ट में दूरी के आधार पर आगरा में बेंच बनाने की सिफारिश की गई। आयोग ने इसके लिए यह आधार भी लिया कि आगरा ऐतिहासिक शहर है और हाईकोर्ट का प्रारंभिक गठन भी यहीं हुआ था, मगर इसका पश्चिम और हाईकोर्ट दोनों जगह विरोध हो गया। पश्चिम के ही कई जिले हाईकोर्ट की बेंच आगरा के बजाए मेरठ में चाहते हैं। इसके विपरीत हाईकोर्ट के विभाजन के विरोध में दी जा रही दलील है संविधान के अनुच्छेद 214 के प्रावधान के अनुसार ‘ प्रत्येक राज्य का एक हाईकोर्ट होगा’। इसलिए खंडपीठ का गठन संविधान में संशोधन किए बिना संभव नहीं है। 

इस संबंध में दूसरे राज्यों में हाईकोर्ट की पीठों की स्थिति दूसरी है। जिन राज्यों में खंडपीठ हैं, वह राज्यों के विलय की वजह से वजूद में आई हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ भी राज्य के विलय के फलस्वरूप बनी है। इसी प्रकार मध्य प्रदेश में भी नागपुर, ग्वालियर और इंदौर में हाईकोर्ट पहले से वजूद में थे। राज्य विलय के बाद नागपुर महाराष्ट्र में शामिल हो गया तो मध्यप्रदेश की प्रधानपीठ जबलपुर स्थानांतरित कर दी तथा इंदौर और ग्वालियर को खंडपीठ का दर्जा दे दिया गया। दूसरी दलील यह भी है कि उच्च न्यायपालिका का विभाजन से इसकी शक्ति कमजोर होगी। यह भी दलील है कि यदि दूरी और आबादी विभाजन का आधार हो सकती है तो सर्वोच्च न्यायालय की देशभर में कई पीठें बननी चाहिए। फिलहाल राजनीतिक दलों को इन संवैधानिक पहलुओं पर विचार करने की फुर्सत नहीं दिखती है। उनका इरादा चुनाव जिताऊ वादों को परोस कर सत्ता हथियाना भर है।
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