इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जमानत एक नियम है और जेल अपवाद। यह दैहिक स्वतंत्रता का विषय है। जमानत आदेश यांत्रिक नहीं होना चाहिए। जमानत आदेश देते समय जमानत देने या नहीं देने का कारण दिया जाना चाहिए और यह भी देखा जाना चाहिए कि अपराधी न्याय में बाधक न बनने पाए। यह न्यायाधीश के न्यायिक विवेक पर निर्भर है कि जमानत दे या नहीं।
हिंदी में दिए गए फैसले में कोर्ट ने कहा कि जमानत देते समय आरोपी के अपराध दुहराने, साक्ष्य से छेड़छाड़, गवाहों को धमकी की संभावनाओं पर विचार करना चाहिए। गवाहों की विश्वसनीयता मामले का गुणदोष आदि विचारण के समय देखे जाएंगे, इसलिए जमानत स्वीकार या अस्वीकार करते समय इस पर विचार नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जमानत अर्जी पर विचार करते समय मनमानी नहीं, सहानुभूति पूर्वक विवेक का प्रयोग करना चाहिए।
जमानत की शर्तें इतनी कड़ी न हों कि पालन असंभव हो जाए। रामपुर के दहेज उत्पीड़न के आरोपी जगपाल की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने दिया है। इसी के साथ कोर्ट ने रामपुर के दहेज उत्पीड़न व हत्या के आरोपी जगपाल की सशर्त जमानत मंजूर कर ली है। कोर्ट ने कहा है कि मृतका की शादी 2013 में याची के बेटे हरवीर सिंह से हुई थी। मृतका शिखा की 18 जनवरी 20 को मौत हो गई। शहवाद थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है ।
कोर्ट ने कहा कि सास मूर्ति देवी ऐसे ही आरोपों पर पहले से जमानत पर हैं। याची अपने बेटे बहू के साथ नहीं रहता था। घटना के पहले दहेज उत्पीड़न की कोई शिकायत नहीं है। याची का आपराधिक रिकार्ड नहीं है। ऐसे में वह जमानत पर रिहा होने का अधिकारी है।