इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अभियुक्त को भगोड़ा घोषित कर दिया गया है और उसकी संपत्ति की नीलामी की जा चुकी है तो भी तथ्यों-परिस्थितियों पर विचार करते हुए अग्रिम जमानत दी जा सकती है। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति डॉ.गौतम चौधरी की पीठ ने नर्स की अग्रिम जमानत अर्जी स्वीकार कर ली।
बिजनौर निवासी याची मोनिका एक अस्पताल में नर्स के रूप में कार्यरत थी। किरतपुर थाने में याची पर 2023 में अजन्मे शिशु की मृत्यु के मामले में मेडिकल काउंसिल एक्ट की धाराओं, धोखाधड़ी सहित विभिन्न आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया था। उन्होंने अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की।
प्रतिवादी अधिवक्ता ने जमानत का विरोध करते हुए दलील दी कि याची के खिलाफ पहले ही गैर-जमानती वारंट जारी किया जा चुका है। उसे भगोड़ा घोषित कर कुर्की की कार्रवाई की जा चुकी है। इसलिए उसे जमानत नहीं मिलनी चाहिए। वहीं, याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि जब गैर जमानती वारंट जारी किया गया तो वह उस समय गर्भवती थी। उसने छह अक्तूबर 2025 को एक बच्चे को जन्म दिया। इस वजह से वह अदालत में पेश होने में असमर्थ थी। उसने अपने वकील के माध्यम से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए आवेदन भी दिए थे, जिसे निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दिया।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद आशा दुबे बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। कहा कि धारा-82 की उद्घोषणा होने का मतलब यह नहीं है कि अग्रिम जमानत पर पूर्ण रोक लग गई है। अदालत को मामले की परिस्थितियों और उद्घोषणा जारी होने के पीछे के कारणों को देखना चाहिए। कोर्ट ने याची की गर्भावस्था और हाल ही में प्रसव को ध्यान में रखते हुए उसे 50,000 रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड और दो प्रतिभूतियों पर ट्रायल पूरा होने तक सशर्त अग्रिम जमानत प्रदान कर दी।