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बाहुबली विधायक विजय मिश्र को हाईकोर्ट से झटका, दुष्कर्म की एफआईआर रद्द करने और गिरफ्तारी पर रोक से इनकार

Wed, 25 Nov 2020 07:06 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
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prayagraj news : विजय मिश्र, विधायक, जानपुर - फोटो : prayagraj
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ज्ञानपुर के बाहुबली विधायक विजय मिश्र को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने विजय मिश्र और उनके बेटे विष्णु मिश्र व एक अन्य के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने और गिरफ़्तारी पर रोक की मांग खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया इस मामले में संज्ञेय अपराध किया जाना प्रतीत हो रहा है। प्राथमिकी में हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं है। याचिका विजय मिश्र, विष्णु मिश्र और विकास मिश्र की ओर से दाखिल की गई थी। इस पर न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई की।

 

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विधायक विजय मिश्र। - फोटो : अमर उजाला
विजय मिश्र सहित तीनों के खिलाफ पीड़ित महिला ने भदोही में प्राथमिकी दर्ज कराई है। महिला का आरोप है कि विधायक उसका वर्ष 2014  से यौन शोषण कर रहे हैं। उसे डरा धमका कर कई बार उन्होंने दुष्कर्म किया। उसकी अश्लील फोटो और वीडियो बना ली है तथा उसके आधार पर यौन शोषण करते आ रहे हैं। पीड़िता ने विधायक के पुत्र विष्णु मिश्र और उसके साथी विकास मिश्र पर भी सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया है।
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भाजपा विधायक विजय मिश्र। - फोटो : अमर उजाला।
बचाव पक्ष की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल चतुर्वेदी और लोकेश कुमार द्विवेदी ने पक्ष रखा। उनकी दलील थी कि प्राथमिकी काफी विलंब से दर्ज कराई गई है। घटना 2014 की है। इससे जाहिर है कि जो हुआ उसमें पीड़िता की सहमति थी। पीड़िता के अन्य लोगों से भी शारीरिक संबंध हैं। उसने पहले भी कई लोगों के खिलाफ इस प्रकार की  शिकायतें दर्ज कराई हैं। इससे जाहिर है कि समाज के प्रभावशाली लोगों के खिलाफ झूठी शिकायत कर उनको  ब्लैकमेल करना पीड़िता की आदत है। 

प्रदेश सरकार के अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि प्राथमिकी दर्ज कराने में जो देरी हुई है उसकी वजह पीड़िता ने स्पष्ट की है। उसे डराया धमकाया गया था और अश्लील तस्वीरों को सार्वजनिक करने के भय में डाला गया था। बाद में कुछ हिम्मत जुटाकर उसने शिकायत की। इस स्थिति में प्राथमिकी में विलंब का अभियोजन पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। जहां तक पहले भी अन्य लोगों के खिलाफ ऐसी शिकायतें दर्ज कराने की बात है। यदि पीड़िता के साथ पूर्व में भी कोई अपराध हुआ था तो उसकी शिकायत दर्ज कराने मात्र से दुबारा ऐसा अपराध होने पर वह शिकायत करने के लिए अयोग्य नहीं हो जाती है।

कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि प्राथमिकी दर्ज कराने में हुए विलंब का पीड़िता ने स्वयं स्पष्टीकरण दिया है कि उसे डराया धमकाया गया था और अश्नलील वीडियो क्लीपिंग बनाई थी। पीड़िता को अपने साथ होने वाले अपराध की शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। कोर्ट ने याचिका में राहत देने का कोई आधार न पाते हुए इसे खारिज कर दिया है।
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