‘जीवन में वह था एक कुसुम, थे उस पर नित्य निछावर तुम, वह सूख गया तो सूख गया, मधुवन की छाती को देखो, सूखी कितनी इसकी कलियां, मुर्झाई कितनी वल्लरियां, जो मुर्झाई फिर कहां खिली, पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुवन शोर मचाता है, जो बीत गई सो बात गई।’ हिन्दी साहित्य के अद्भुत चितेरे हरिवंश राय ‘बच्चन’ की यह पंक्तियां उनके अपने ही गांव बाबूपट्टी पर सटीक बैठती हैं। आज बच्चन की जयंती है और अपनों के बीच वे पराए से दिखते हैं। गांव में कहीं कोई शोर नहीं, न ही चर्चा। हां, जब बात निकलती है तो लोग जरूर कहते हैं, हां...., मधुशाला! बच्चन तो हमारे ही गांव के थे। यहां नई पीढ़ी ने ‘बच्चन’ को पढ़ा तो नहीं, उनका नाम जरूर सुना है।
प्रतापगढ़ में रानीगंज का बाबूपट्टी गांव बाकी दूसरे गांवों जैसा ही है। दोपहर करीब 12 बजे का समय। लोग रोज की तरह अपने कामों में लगे थे। गांव में गांधी चबूतरा चौराहे के पास चाय-पान की दुकान पर चंद लोग गप्पे लड़ा रहे थे। कहीं कोई ऐसा आभास नहीं कि आज का दिन गांव के लिए कुछ खास है। बच्चन के जन्मदिन को लेकर न कोई तैयारी, न कोई चर्चा। दुकान पर बैठे लोगों से जब ‘मधुशाला’ पर चर्चा हुई तो एक-एक कर लोग पास आते गए। नई पीढ़ी में अधिकांश को यह नहीं पता था कि मधुशाला क्या है। इतना जरूर कहा कि इसे हरिवंश राय बच्चन ने लिखा है और वे हमारे ही गांव के थे। लोगों को जमा देख पूर्व प्रधान पंकज शुक्ला भी चले आए। बोले, मधुशाला तो नहीं पढ़ी, लेकिन बच्चनजी की आत्मकथा ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ पूरी पढ़ी है।
उसमें गांव का जिक्र है। आगे बढ़ने पर राजेश कुमार सरोज मिले। पूछने पर कहा, ‘मधुशाला’ के बारे में तो पीने वाले ही बेहतर ढंग से बता पाएंगे। गांव के ही अभिताभ श्रीवास्तव ने खुद को बच्चन का पट्टीदार बताया और चार पंक्तियां भी सुनाईं। बोले, बाबा से सुनने को मिला था कि हरिवंशजी पहली बार 12 साल की उम्र में किसी की शादी में और दूसरी बार चार साल बाद 16 साल की उम्र में गांव आए थे। थोड़ी दूरी पर सुनील श्रीवास्तव मिले। वह भी खुद को बच्चनजी का पट्टीदार बताने लगे। ‘मधुशाला’ के बारे में पूछने पर बोले, ज्यादा तो नहीं पता, लेकिन हाईस्कूल का पाठ्यक्रम देखेंगे तो इसके बारे में जानकारी हो जाएगी। कुछ ऐसा ही जवाब चंडीसहाय मिश्र ने दिया। बोले, ‘मधुशाला’ की लाइनें तो याद नहीं हैं, लेकिन बच्चनजी ने समाज की वेदनाओं को देखते हुए यह किताब लिखी थी।
अमिताभ के चुनाव में मिले थे बाबूजी से
बाबूपट्टी गांव के नीम चौरा के पास राजेंद्र श्रीवास्तव मिले। वह भी खुद को बच्चनजी का पट्टीदार बताने लगे। बोले, 1985 में जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से चुनाव लड़ थे, तब बाबूजी से मुलाकात हुई थी। तब मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। उसी दौरान हरिवंशजी इलाहाबाद आए और सर्किट हाउस में रुके। गांव से आए शारदा चाचा के साथ मैं उनसे मिलने के लिए सर्किट हाउस गया। पहले दिन मुलाकात नहीं हो पाई और लौटना पड़ा। दूसरे दिन हम लोगों ने बाबूपट्टी लिखकर चिट्ठी भेजी। इस पर हरिवंशजी ने तुरंत अंदर बुलवा लिया। अमिताभ बच्चन उस समय प्रचार में निकले हुए थे। करीब 15 मिनट उनसे बात हुई। बाबूजी हमें रोक रहे थे कि अमित आ रहा है, मुलाकात कर लो, लेकिन शारदाजी फिर आने की बात कहकर निकल गए। बाबूजी ने चुनाव बाद बाबूपट्टी आने का वादा किया था, लेकिन किन्हीं कारणों से वह नहीं आ सके।
अंताक्षरी में गाई जाती थी ‘मधुशाला’
पोस्टमास्टर के पद से रिटायर हुए 76 साल के आशाराम मिश्र घर के दरवाजे के सामने कुर्सी लगाकर बैठे थे। ‘मधुशाला’ के बारे में पूछने पर पांच पंक्तियां पढ़कर सुनाईं। कहा, मधुशाला में बच्चनजी के आध्यात्मिक विचार हैं। जब हम लोग छठवीं-सातवीं कक्षा में पढ़ते थे तो अंताक्षरी में ‘मधुशाला’ गाई जाती थी।