इलाहाबाद। अजीम शायर और नामवर उस्ताद मोअज्जम पाशा नहीं रहे। वह 75 वर्ष के थे। उन्हें सांस में तकलीफ की शिकायत पर मंगलवार रात एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां बुधवार की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। वह अपने पीछे दो बेटे और तीन बेटियां छोड़ गए हैं। उनके इंतकाल की खबर सुनकर अदीबों और उनके चाहनेे वालों का उन्हें आखिरी सलाम कहने केलिए तांता लग गया। बृहस्पतिवार को शाहगंज स्थित आवास से सुबह 11 बजे उनका जनाजा निकलेगा और चकिया स्थित करबला में सुपुर्दे खाक किया जाएगा।
डॉ.वाहिद हुसैन केबेटे और मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी के परिवार से जुड़े मोअज्जम ने गजल, नज्म, कसीदे सहित हर तरह की शायरी की। ‘या हुसैन अलविदा’ जैसे मशहूर नौहे सहित उन्होंने तकरीबन पांच हजार से अधिक नौहे लिखे जो दुनिया भर में मशहूर हुए। जिंदगी भर अदब की खिदमत में लगे रहे मोअज्जम दूसरों की रचनाओं को दुरुस्त भी करते थे। इसीलिए वह शायरों के उस्ताद भी कहे जाते थे। बावजूद इसके उन्हें प्रचार का कोई शौक नहीं था।
उनके चाहने वालों ने ही उनकी तमाम चीजें पत्र-पत्रिकाओं और अन्य जगहों पर प्रकाशित कराईं। निर्माता निर्देशक मुजफ्फर अली उनके मुरीद थे। उन्होंने अपनी फिल्म अंजुमन में उनका प्रसिद्ध नौहा ‘या हुसैन अलविदा’ शामिल किया। यह नौहा बीबीसी की फिल्म में भी सुनने और देखने को मिला। हालिया प्रदर्शित फिल्म ‘जांनिसार’ में भी मुजफ्फर अली ने उनके नौहे का इस्तेमाल किया था। शायर नजीब इलाहाबादी, तौकीर जैदी सहित सैयद अजादार हुसैन, तनवीर जैदी, मेहंदी आब्दी आदि ने उनके इंतकाल को अदब का बड़ा नुकसान बताया है।