इलाहाबाद। जाने-माने गीतकार-संगीतकार रवींद्र जैन का जाना संगमनगरी के संगीतप्रेमियों को आहत कर गया है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ख्याति और उपलब्धियां अर्जित करने वाले रवींद्र जैन का यहां से गहरा नाता रहा। उन्होंने प्रयाग संगीत समिति से ही प्रभाकर का डिप्लोमा किया था। सांस्कृतिक केंद्र के चलो मन गंगा यमुना तीर और पथरचट्टी, पजावा रामलीला कमेटियों के अतिरिक्त संगमनगरी से जब भी न्योता मिला, दूसरे कार्यक्रमों को परे रखकर वह इलाहाबाद आए। इलाहाबाद से गुजरते हुए भी वह कुछ पल यहां जरूर गुजारते, स्थानीय कलाकारों से बोलते-बतियाते और उन्हें शुभकामनाओं का आशीष देकर विदा हो जाते।
उनकी सहजता ने कभी इस बात का भान नहीं होने दिया कि वह महान कलाकार हैं। तकरीबन सवा वर्ष पहले विश्व गुर्दा दिवस पर चंद्रशेखर आजाद पार्क में हुए समारोह में वह आए थे। गायक कलाकार मनोज गुप्ता कहते है, दादू की खूबी थी कि वह जिस आयोजन में जाते थे, वहां के लिए एक गीत तुरंत तैयार करते थे। जब भी वह इलाहाबाद आए, स्नेह के साथ मंच पर अवसर दिया। गायक कलाकार आशुतोष श्रीवास्तव कहते हैं, यह सौभाग्य की बात है कि दादू के साथ मंच साझा करने का मौका मिला। वह जिस सहजता से मिलते थे, ऐसा बड़े कलाकारों के साथ कम ही होता है।
पजावा रामलीला कमेटी के राजगद्दी संयोजक मोहनजी टंडन ने स्मृतियां सहेजीं। कहा, राजगद्दी समारोह के लिए आने का न्योता दिया तो पूरे उत्साह से उन्होंने हामी भरी और अपनी मौजूदगी से समारोह को यादगार बना दिया। उनकी कमी हमेशा खलेगी। वहीं पथरचट्टी रामलीला कमेटी की कार्यकारी अध्यक्ष मुकेश पाठक की अध्यक्षता में हुई सभा में भी रवींद्र जैन को श्रद्धांजलि दी गई। वक्ताओं ने कहा, भारतीय संगीत के पोषक और आशुकवि रवींद्र जैन को पथरचट्टी से गहरा लगाव था। उन्होंने तीन बार पथरचट्टी के समारोह की शान बढ़ाई।
प्रयाग संगीत समिति की शोक सभा में सचिव अरुण कुमार ने कहा, पिछली बार वह विद्यार्थियों से मिलने के लिए सिर्फ पंद्रह मिनट का समय लेकर आए थे लेकिन दो घंटे से ज्यादा बच्चों केबीच रहकर उन्हें संगीत की बारीकियां सिखाते रहे। उनका जाना भारतीय संगीत जगत का बड़ा नुकसान है। शोकसभा में विद्यार्थियों, कर्मचारियों के साथ शिक्षक-शिक्षिकाएं मौजूद थीं।