दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों में पांच हजार की आबादी पर एक स्वास्थ्य उपकेंद्र होते हैं। इसमें एक हजार की आबादी पर एक आशा कार्यकर्ता का चयन होता है। चयन प्रक्रिया के लिए जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में जिलाधिकारी से अनुमोदन लिया जाता है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जिस गांव में चयन होना है, वहां खुली बैठक आयोजित होती है। बैठक में ग्राम प्रधान, एएनएम और सेक्रेटरी शामिल होते हैं, इसमें उसी गांव की अभ्यर्थी से आवेदन लिया जाता है। यह दोनों प्रक्रिया नहीं कराई गई। चयन कर तीनों आवेदन संबंधित सीएचसी के अधीक्षक व बीसीपीएम के पास भेजे गए। वहीं कीडगंज निवासी बलराम पांडेय की ओर से मुख्यमंत्री के यहां इसकी शिकायत की गई थी।
जल्दबाजी में हुई ट्रेनिंग
वहीं तत्कालीन एसीएमओ डॉ. तरूण पाठक व डीसीपीएम अशफाक अहमद की ओर से आनन-फानन बिना बजट मिले ही इन आशाओं की आठ दिवसीय ट्रेनिंग भी करा दी। ताकि बाद में इसमें कोई सवाल न उठे।
अभी आशा भर्ती मामले की जांच चल रही है, इसलिए इस संबंध में कुछ भी कहना सही नहीं होगा, जांच के बाद ही क्या सही है, सामने आएगा। - डॉ. एके तिवारी, सीएमओ।