‘हमारी चंद तस्वीरें कहीं महफूज कर लीजे, सवाल उठ्ठेगा मुस्तकबिल में आखिर आदमी क्या है’ कहने वाले मशहूर शायर डॉ.जमीर अहसन नहीं रहे लेकिन अलविदा कहकर हमें आदमी के मायने बता गए। आमतौर पर गज़लों के केंद्र में माशूका को रखने के मिथक को तोड़ते हुए उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ सामाजिक सरोकारों और सद्भाव को गज़लों की आबरू बनाया। सांप्रदायिक सद्भाव के लिए हजार से ज्यादा गज़लें लिखीं।
कहते थे, ‘ये शहर मोम के महलों से फिर सजाना है, क्या घटा रुके कि चढ़े धूप कुछ ठिकाना है।’ तंज कसने में भी वे कभी पीछे नहीं रहे, ‘सुकून अम्न के दौरान भी कहां हमको/इन्हीं दिनों में तो हम असलहे बनाते हैं’ लेकिन नसीहत भी देते थे, ‘आग ठंडी कीजिये बरसा के अपना खून भी, आप अगर जलता हुआ कोई कहीं घर देखिये।’ आनंद भवन में बच्चों के लिए भी टिकट लगा तो जमीर से रहा नहीं गया, ‘लगने लगा है जबसे टिकट आनंद भवन में, सब बच्चों ने नेहरू जी को चाचा कहना छोड़ दिया।’
पेशे से डॉक्टर जमीर अहसन ने पूरे चौदह वर्षों की रचनात्मक सक्रियता के बाद तुलसीकृत रामचरित मानस का ‘दरिया से दरिया तक’ नाम से पहली बार उर्दू में, फारसी और देवनागरी लिपियों में अनुवाद किया। ‘हर्फों की सौगात अता की, बख्शे हैें अल्फाजो मआनी/होठों ने गोयाई मांगी, पाया शऊरे नगमागरी’ से शुरुआत करके मानस कोउर्दू के पाठकों तक पहुंचाया। कई बार एक चौपाई के लिए कई शेर भी कहे। अफसोस कि किसी एकेडेमी या संस्था ने उनकी कोशिश को किताब की शक्ल में पाठकों तक पहुंचाने में कोई मदद नहीं की। रामायणम ट्रस्ट ने प्रकाशन की हामी भरी थी, पर बाद में मुकर गया। जयप्रकाश अग्रवाल स्मारक न्यास की ओर से डॉ.जमीर की ही जुबानी इसकी आडियो-वीडियो रिकार्डिंग की गई थी।
रामचरित मानस के बाद डॉ.जमीर ने कृष्ण चरित पर भी कलम चलाई। खुसरो, रसखान और जायसी की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कवि जगन्नाथ रत्नाकर की रचना ‘उद्धव शतक’ का भी पहली बार उर्दू में पद्य अनुवाद किया। साथ ही कवित्त और सवैया के सौ ही छंदों सहित उर्दू के छंद-प्रबंध, अनुशासन में रचा। कृष्ण, प्रेम की पवित्रता और दर्शन को सहजता से समझाते हैं,‘तुम्हारे जैसा मैं भी हूं, न मुझको देवता समझो/मोहब्बत है मेरा पैगाम बंसी की सदा समझो/जियो ऐसे कि दुनिया के मसर्रत बांटते जाओ/किसी भी राह से गुजरो मोहब्बत बांटते जाओ।’
उन्होंने पैगंबरे इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब, इमाम, खलीफा आदि का जीवन चरित और हम्द (खुदा की तारीफ) भी लिखी। ‘खुतबा हज्जतुल वदा’ का पहली बार अरबी से हिन्दी में लिप्यांतर यानी उस तकरीर का तर्जुमा किया, जिसे पैगंबरे इस्लाम ने अंतिम हज के मौके पर अराफात के मैदान में लाखों जायरीनों को खिताब किया। ‘कांटा चुभे तो कांटों पे फिर चल के देखिये, मुमकिन है कोई कांटा ही कांटा निकाल दे’ जैसी सोच रखने वाले मशहूर शायर डॉ.जमीर की तस्वीरें अदब के जेहन में हमेशा रहेंगी। कभी जुदा नहीं होंगे, अदब की खिदमत करने वाले जमीर।
राष्ट्रीय एकता के लिए रचनात्मक लेखन पर वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से ‘सौहार्द सम्मान’ सहित नगर निगम की ओर से ‘तुलसी सम्मान’, बिड़ला फाउंडेशन की ओर से ‘त्रिवेणी शिखर सम्मान’, रामायणम ट्रस्ट की ओर से ‘रामकिंकर सम्मान’, समन्वय की ओर से ‘चेतनाश्री’ और बहादुरशाह जफर मेमोरियल सोसाइटी की ओर से ‘बहादुरशाह जफर अवार्ड’ मिले। उन्हें सुतूने अदब, सुखनवरे इलाहाबाद, त्रिवेणी शिखर सम्मान से भी से नवाजा गया है।