आनंद भवन : 17 साल में जमा किए सिर्फ 10 हजार 200 रुपये
बकाया गृहकर मामले में जांच शुरू, महापौर ने निगम के अफसरों से मांगा ब्यौरा
वर्ष 2016 में ट्र्स्ट ने 2003 के गृहकर पर लघुवाद न्यायाधीश के यहां की थी अपील
प्रयागराज। आनंद भवन, स्वराज भवन, तारामंडल और नेहरू संग्रहालय पर गृहकर के मद में 4.35 करोड़ रुपये बकाया के मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है। इसी के साथ चौंकाने वाली जानकारियां भी सामने आ रही हैं। नगर निगम के दस्तावेजों से पता चला है कि बीते 17 साल जवाहर लाल नेहरू स्मारक निधि ने गृहकर मद में सिर्फ 10 हजार दो सौ रुपये ही जमा किए हैं। जबकि साल दर साल बकाया राशि बढ़ती रही और मूल्यांकन भी संशोधित होता रहा। ट्रस्ट बकाये की राशि को गलत बता रहा है। इधर, नगर निगम के जारी वसूली नोटिस से मचे हंगामे के बाद महापौर ने इसकी जांच शुरू करा दी है।
महापौर ने जवाहर लाल नेहरू स्मारक निधि के प्रशासनिक सचिव के पत्र के आधार पर आनंद भवन पर बकाया कर से संबंधित ब्यौरा मांगा है। इस मामले में मुख्य कर निर्धारण अधिकारी को जांच के निर्देश दिए हैं। वहीं ट्रस्ट ने गृहकर माफी का पत्र तो नगर निगम को दे दिया है, लेकिन ट्र्स्ट संबंधी कागजात उपलब्ध नहीं कराए हैं। जिसके बिना निगम गृहकर में छूट देने को तैयार ही नहीं है।
आनंद भवन गृहकर मामले की जांच में प्रथम दृष्टया यह तथ्य सामने आया है कि वर्ष 2003 से ट्र्स्ट ने हर साल छह सौ रुपये सालाना की दर से ही गृहकर के मद भुगतान किया है। वहीं, वर्ष 2003 के बाद वर्ष 2013-14, फिर वर्ष 2014-15 में वार्षिक मूल्यांकन और गृहकर की दरों में बदलाव किया गया। संशोधित गृहकर की दरों की अनदेखी करने से बकाया बढ़ता गया।
जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि वर्ष 2016 में जवाहर लाल नेहरू स्मारक निधि की ओर से वर्ष 2003 में आरोपित गृहकर में संशोधन की अपील लघुवाद न्यायाधीश (जेएससीसी) के यहां की गई। इस संबंध में नगर निगम के कर विभाग से संपर्क नहीं किया गया और न ही कर संशोधन या माफी का आवेदन किया गया। इस अनदेखी का परिणाम रहा कि आनंद भवन पर गृहकर के मद में बकाया धनराशि ब्याज समेत साल दर साल बढ़ती रही।
इस बारे में नगर निगम के मुख्य कर निर्धारण अधिकारी पीके मिश्रा का कहना है कि गृहकर की दरों का निर्धारण नियम के मुताबिक किया गया है। अगर ट्रस्ट को गृहकर माफी चाहिए थी तो चैरिटेबिल ट्रस्ट संबंधी दस्तावेज निगम के पास आवेदन के साथ जमा कराए गए होते। मगर ऐसा नहीं किया गया। अब दस्तावेज मिलने के बाद ही इस पर कोई निर्णय लिया जाएगा।