ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम हिमालय के असली शंकराचार्य को लेकर चल रहे विवाद पर सिविल कोर्ट के फैसले ने विराम तो लगा दिया, लेकिन अब यह मामला ऊपरी अदालतों में में न जाए इसके लिए अखाड़ा परिषद ने कवायद शुरू कर दी है। मंगलवार को सिविल कोर्ट ने शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ही ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम का शंकराचार्य माना है।
अखाड़े के संतों का मानना है कि सनातन धर्म के सर्वोच्च पद के लिए जो फैसला कोर्ट ने कर दिया है, उसे दोनों पक्ष मान लें और अब अदालती कार्यवाही से बचें। यदि किसी भी पक्ष को कोई दुविधा हो तो उसे मिल बैठकर दूर कर लिया जाए, ताकि सनातन धर्म की गरिमा बरकरार रहे। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष स्वामी नरेंद्र गिरि इस बाबत ज्योतिष एवं द्वारका शारदापीठाश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती और स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को सिविल कोर्ट का फैसला मान कर आगे की अदालती लड़ाई पर विराम लगाने को राजी करने के प्रयास में जुट गए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शंकराचार्य पद के लिए अदालती लड़ाई न आगे बढ़े इसके लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे, जो फैसला आया है उसका सम्मान दोनों पक्षों की ओर से किया जाए। उन्होंने बताया कि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से इस बारे में फोन से बातचीत की जा चुकी है। स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती से बातचीत का प्रयास हो रहा है।
इनसेट में
स्वामी नरेंद्र गिरि ने अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष ज्ञानदास द्वारा शंकराचार्य के बारे में टिप्पणी करने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने दो टूक कहा कि ज्ञानदास को शंकराचार्य के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है। शंकराचार्य और अखाड़ों की परंपरा को जाने बगैर शंकराचार्य के बारे में बोलने वाले हमारी मर्यादा को कमजोरी न समझें।