ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम हिमालय के असली शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ही हैं। पीठ के शंकराचार्य पद को लेकर चल रहे विवाद का पटाक्षेप करतेे हुए मंगलवार को सिविल कोर्ट ने शंकराचार्य के पद पर स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती का दावा खारिज कर दिया है। वासुदेवानंद के शंकराचार्य की पदवी, छत्र, चंवर और सिंहासन धारण करने पर अदालत ने सदैव के लिए रोक लगा दी है। 308 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में सिविल जज गोपाल उपाध्याय ने वासुदेवानंद द्वारा प्रस्तुत वसीयत को फर्जी करार देते हुए उनको शंकराचार्य पद के लिए अयोग्य करार दिया है।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्वामी स्वरूपानंद के इस दावे को स्वीकार किया कि वह सात दिसंबर 1973 से इस पीठ के शंकराचार्य हैं तथा महानुशासनम् में लिखित नियमों के तहत कार्य कर रहे हैं। वह शंकराचार्य होने की सभी योग्यताएं रखते हैं और उनकी नियुक्ति वैध है। दूसरी ओर वासुदेवानंद द्वारा स्वयं को वास्तविक शंकराचार्य होने का दावा कोर्ट ने खारिज कर दिया है। उनके द्वारा प्रस्तुत सात अप्रैल 1989 को निष्पादित वसीयत भी फर्जी घोषित कर दी है। कोर्ट ने 15 नवंबर 1989 को शंकराचार्य के रूप में हुए वासुदेवानंद के अभिषेक को भी अवैध तथा अविधिक करार दिया है। अदालत ने आदि शंकराचार्य द्वारा रचित महानुशासनम् मेें शंकराचार्य बनने के लिए बताई गई योग्यताओं पर विचार करते हुए निष्कर्ष दिया है कि वासुदेवानंद इसके अनुरूप योग्यता नहीं रखते हैं।
स्वरूपानंद के दावे पर विचार करते हुए अदालत ने उनकी योग्यता और नियुक्ति को सही ठहराया है। कोर्ट ने वासुदेवानंद के इस दावे को खारिज कर दिया कि दो पीठों का एक शंकराचार्य नहीं हो सकता है। स्वरूपानंद को सात दिसंबर 1973 को शंकराचार्य बनाए जाने और तब से उनके लगातार इस पर बने रहने के दावे को अदालत ने सही पाया है।