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इलाहाबाद सीटः जाति के चक्रव्यूह में फंसा ‘राफेल’, ‘राष्ट्रवाद’

Mon, 13 May 2019 01:44 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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रीता बहुगुणा जोशी - फोटो : amar ujala
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कांग्रेस के राफेल और भाजपा के राष्ट्रवाद का मुद्दा इलाहाबाद संसदीय सीट के लिए हुए चुनाव में जाति के चक्रव्यूह को तोड़ने में नाकाम नजर आया। कम से कम ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं के बीच ये मुद्दे नदारद रहे। हालांकि शहर में मोदी की सर्जिकल स्ट्राइक का असर दिखा और साथ ही सामने आए नए समीकरण ने यह संकेत भी दिए कि इस बार दावे के साथ कुछ भी कहना मुश्किल है। 
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इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र में यमुनापार के करछना, मेजा, कोरांव और बारा विधानसभा क्षेत्र के साथ शहर दक्षिणी शामिल है। गांव हो या शहर चुनाव मोदी और गठबंधन के बीच होता नजर आया लेकिन मुद्दों पर मतदाता बंटे नजर आए। यमुनापार के चारों विधानसभा क्षेत्रों में मुद्दा जाति रहा तो शहर दक्षिणी में जाति के साथ सर्जिकल स्ट्राइक, मिग-21 का फाइटर पायलट, राजीव गांधी का आईएनएस विराट का मुद्दा भी छाया रहा। एक तरफ यमुनापार में जातिगत मुद्दों के आधार पर भाजपा और गठबंधन के बीच कांटे की टक्कर नजर आई, वहीं शहर दक्षिणी के वोटरों ने इस चुनावी जंग में निर्णायक होने के संकेत दिए। 

पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार ओबीसी मतदाता बंटे नजर आए। मुद्दों को लेकर उनमें बिखराव साफ नजर आया। मेजा के बरसैता गांव से एक किलोमीटर दूर अपने परिवार की नौ महिलाओं को लेकर बंधवा प्राथमिक विद्यालय में मतदान के लिए पहुंचे सुरेंद्र प्रसाद गौड़ अति पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। वह इस बात से खुश थे कि किसान सम्मान निधि के तहत उनके खाते में चार हजार रुपये आ चुके हैं। हालांकि परिवार की महिलाओं को यह बात नहीं मालूम थी। उनका सिर्फ यही कहना था कि घर के मुखिया ने जिसे वोट देने को कहा, वहीं बटन दबा दिया। वहीं, करछना के कौआ स्थित मतदान केंद्र के पास वोटर डालकर निकल रहे आनंद पटेल, राजकुमार, अशोक बिंद, राजेश का कहना था कि गांव में किसी मुद्दे पर चर्चा नहीं होती है। लोग परंपरागत रूप से जहां वोट देते आए हैं, इस बार भी वहीं दिया है। 
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बद्रीनाथ तिवारी इंटर कॉलेज में आए कुछ मतदाताओं से पूछा गया कि यहां से चुनाव कौन लड़ रहा है तो किसी ने मोदी और किसी ने अखिलेश यादव या मायावती का नाम लिया। यमुनापार के ज्यादातर बूथों की कमोवेश यही स्थिति रही। वोटरों को प्रत्याशी नहीं बल्कि मोदी और गठबंधन से मतलब था। हालांकि शहर के मतदाताओं ने मोदी के साथ प्रत्याशी के नाम से भी अच्छी तरह परिचित दिखे लेकिन शहर में भी प्रत्याशी से ज्यादा गठबंधन लड़ता हुआ नजर आया। 
निर्णायक साबित हो सकते हैं दलित वोटर
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yogesh shukla - फोटो : प्रयागराज
इलाहाबाद संसदीय सीट के चुनाव परिणाम में दलित वोटर निर्णायक साबित हो सकते हैं। हालांकि ऐसे वोटर खुले तौर पर कुछ भी बोलने से बचते रहे लेकिन मोदी समर्थकों से इतर उनकी चुप्पी ने गठबंधन से उनके लगाव का संकेत जरूर दे दिया। शहर और ग्रामीण इलाके, इलाहाबाद संसदीय सीट के सभी पांचों विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दे गुम रहे। मतदान केंद्रों के बाहर वोटरों के बीच चर्चा चल रही चर्चा भी मोदी और गठबंधन के इर्दगिर्द ही घूमती रही। चर्चा हुई भी तो भाजपा की किसान सम्मान निधि की, जिसके तहत किसानों के खाते में चार हजार रुपये आ चुके हैं या फिर कांग्रेस की न्याय योजना पर चर्चा केंद्रित रही। सड़क, पानी, बिजली, सिंचाई, नोटबंदी, जीएसटी जैसे मुद्दों से मतदाताओं का कोई सरोकार नजर नहीं आया।
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