वेद हमारी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए अमूल्य निधि हैं। हमेें इसे विदेशियों के नजरिए से नहीं बल्कि स्वयं व्याख्या करनी चाहिए। यह विचार नेहरू ग्राम भारती विवि के कुलपति प्रो. केबी पांडेय ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार के समापन के अवसर पर व्यक्त किए। प्रो. पांडेय ने संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रो. केजे नसरीन को इस प्रकार के कार्यक्रम के आयोजन के लिए बधाई दी। उन्होंने जैन, बौद्ध, सिख, इसाई, इस्लाम और वैदिक दर्शन के व्याख्याताओं को एक मंच पर एकत्रित किए जाने एवं सर्वधर्म समभाव के लिए विभागाध्यक्ष को धन्यवाद दिया।
कार्यक्रम में शामिल चित्रकूट ग्रामोदय विवि के कुलपति प्रो. नरेश चंद्र गौतम ने विषय की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए मानवता को धर्म का प्राण बताया। संपूर्णानंद संस्कृत विवि के कुलपति प्रो.यदुनाथ दुबे ने कहा कि नास्तिक एवं आस्तिक सभी दर्शनों के द्वारा एक परमसत्य को स्वीकार किया जाता है। रामभद्राचार्य विकलांग विवि चित्रकूट के कुलपति प्रो. योगेश चंद्र दुबे ने कहा कि भारतीय ऋषियों ने परमार्थिक सत्ता तक पहुंचने के लिए व्यावहारिक सत्ताओं की परिकल्पना की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में इविवि के कुलपति प्रो ए. सत्यनारायण ने पूर्व के वक्ताओं के विचारों का समन्वय करते हुए मानवता को परमसत्य का मूल रूप स्वीकार किया। संस्कृत विभाग की अध्यक्ष प्रो. केजे नसरीन ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन डॉ. राम सेवक दुबे तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. दामोदर राम त्रिपाठी ने किया।