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मानो कहना, न हो प्यार में फना

Tue, 09 Feb 2016 01:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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1.शादी के लिए परिजनों की रजामंदी नहीं मिलने से दुखी थरवई का प्रेमी जोड़ा अपने माता-पिता को जीवन भर का दर्द दे गया। रविवार को उन्होंने कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली। साथ में पकड़े जाने के बाद युवक की पिटाई भी की गई थी। इससे भी दोनों काफी निराश थे।
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2.सराय ममरेज इलाके के प्रेमी जोड़ ने भी आत्महत्या जैसा कदम उठाने से पहले यह नहीं सोचा कि उनके बाद माता-पिता का क्या होगा। पिछले साल सितंबर में प्रेमी ने जहर खाकर जान दे दी थी। जानकारी होने पर प्रेमिका भी फांसी पर लटक गई।
3.यही कहानी एक साल पहले सोरांव में घटित हुई थी। प्यार पर पहरा लगाए जाने पर उन्होंने ट्रेन के नीचे आकर जान दे दी और माता-पिता को जीवन भर के लिए बेसहारा छोड़ गए।
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किशोरावस्था की जिस उम्र में पूरी दुनिया को मुट्ठी में करने और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, उम्र के उस पड़ाव पर प्रेम में पड़कर जीवन खत्म करने के ये कुछ उदाहरण मात्र नहीं हैं। खुद के द्वारा परिभाषित इस प्यार को सबकुछ समझने और अपने निर्णय को ही सही मानने वाले युवा स्वतंत्रता पर किसी तरह की पहरेदारी बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं और प्रेम में इस तरह से आत्महत्या की घटनाएं कॉमन हो गई हैं।

मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों का कहना है कि जाति और धर्म को लेकर सामाजिक बंदिशें तो हैं लेकिन बदलते दौर में माता-पिता की इससे कहीं अधिक चिंता उनके कॅरियर को लेकर है। इसीलिए कॅरियर बनाने की उम्र में प्रेम और शादी के लिए भटके कदमों को रोकने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके हस्तक्षेप को स्वतंत्रता का हनन मान बैठे युवा बगावती कदम उठा लेते हैं। साथ-साथ पढ़ने वाले युवाओं को समझना चाहिए कि परिवार में बिजनेस या आजीविका का कोई स्थायी साधन न हो तो कॅरियर बनाने में समय लगेगा। दोनों परिवारों को उन्हें हकीकत से परिचित कराना चाहिए ताकि वे भावावेश में कोई ऐसा कदम न उठा बैठें जो उनके लिए अहितकारी हो। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रवृत्ति को कम करने के लिए घर, मीडिया और स्कूल तीनों स्तर पर काउंसलिंग की जरूरत है।


इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर दीपा पुनेठा का कहना है कि प्रेम में आत्महत्या की घटनाएं किशोरावस्था में अधिक हैं। इस उम्र में संवेग हाई लेवल के होते हैं। उनमें सामाजिक व्यवस्था से बहुत सरोकार नहीं होता। यह इस उम्र का तकाजा भी है। आत्महत्या के परिणाम को नहीं जानते। माता-पिता चाहते हैं कि उनका पाल्य स्वावलंबी हो। रोक-टोक इसीलिए है कि वे कमाते नहीं हैं। पश्चिमी देशाें में बंधन नहीं है। अब यहां मेट्रो शहरों में भी बिना विवाह के साथ में रहने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी है। इससे बेरोजगारी की समस्या बढ़ गई है। युवा छोटी-छोटी नौकरियों के पीछे भाग रहा है। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए किशोरावस्था में पहुंचते ही काउंसलिंग कराने की जरूरत है।

काउंसलिंग में यह ध्यान देने की जरूरत है कि प्रत्यक्ष तौर पर उन्हें न समझाया जाए। वे प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं। इसलिए अप्रत्यक्ष रूप में तथा उदाहरणों के माध्यम से उनमें अच्छे-बुरे की समझ विकसित करने की जरूरत है। जानी-मानी समाजशास्त्री सीएमपी डिग्री कालेज की हेमलता श्रीवास्तव का कहना है कि कम उम्र में इस व्यवहार को समाजशास्त्री प्यार नहीं मानते। आकर्षण मानते हैं। दोनों तरफ से जब यह आकर्षण होता है तो किशोर उसे प्यार मान लेते हैं। ऐसी स्थिति में माता-पिता उनके स्थायित्व की बात करते हैं तो वे उसे स्वतंत्रता का हनन समझते हैं। इसलिए जरूरी है कि उन्हें स्कूल, कालेज और परिवार के स्तर पर उनकी काउंसलिंग की जाए। लड़कियों को शुरू से ही समझाना चाहिए कि परास्नातक से पहले वे शादी के बारे में न सोचें। लड़कों को समझाने की जरूरत है कि वे पहले कॅरियर संवारे। हेमलता का कहना है कि यदि 16-17 साल का लड़का या लड़की आत्महत्या करे तो अभिभावकों को भी समझना चाहिए कि लालन-पालन में कुछ कमी है। परिवार में भावनात्मक लगाव नहीं मिलने पर बच्चे बाहर प्यार ढूंढ़ते हैं। ऐेसी मनोदशा में विरोध पर वे जल्दी टूट भी जाते हैं। इसलिए अभिभावकों को इस बारे में सोचना चाहिए।
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