मशहूर शायर निदा फाजली का इस दुनिया से रुखसत होना अदीबों को आहत कर गया है। इलाहाबाद से उनका गहरा नाता रहा। यहां से कवि-सम्मेलन मुशायरे का जब भी कोई न्योता मिला, वह अपने तमाम दूसरे कार्यक्रम रद्द करके आए। तकरीबन दो वर्ष पहले सांस्कृतिक केंद्र के राष्ट्रीय शिल्प मेले के मुशायरे में वह आए तो कोई नहीं जानता था कि अब निदा से दोबारा मुलाकात नहीं होगी।
वरिष्ठ शायर बुद्धिसेन शर्मा कहते हैं, निदा का जाना हम सभी को रुला गया है। सूफियाना मिजाज के निदा के चेहरे पर कभी भी गुस्सा नहीं दिखा। वह जितने बड़े शायर थे, उतने ही सहज। उनकी शख्सियत और रचनाएं दोनों बेमिसाल हैं। सुपरिचित कवि यश मालवीय ने कहा, निदा के साथ हमने अपना अभिभावक खो दिया है। वह जितने सहज व्यक्तित्व के मालिक थे, उतने ही अद्भुत रचनाकार। सहजता के साथ बड़ी से बड़ी बात कहना उन्हीं के बस का था। जाने-माने सर्जन डॉ.नीरज त्रिपाठी कहते हैं, वह जितने बड़े शायर थे, उतने ही बड़े जमीन से जुड़े इंसान भी। उनकी कमी हमेशा खलेगी। 28 दिसंबर 2013 की रात उन्हें होटल के कमरे से लेकर एनसीजेडसीसी में शिल्प मेले के मुशायरे तक लाया था। नहीं जानता था कि यही आखिरी मुलाकात होगी।
कवि राजेश कुमार ने कहा, निदा का जाना लगभग वैसा ही है, जैसे देखते-देखते नदी का समुद्र में विलीन हो जाना। पर नदियां समुद्र में विलीन कहां होती हैं। वह अपने गीत, गज़ल, दोहों के साथ हमेशा जिंदा रहेंगे। प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी ने स्मृतियां सहेजीं। कहा, वह गंगा जमुनी तहजीब के नुमाइंदे थे। उनकी अभिव्यक्ति सहज, सरल थी। वह जोश के बहुत बड़े फैन थे, उन्हें दूसरों की भी बहुत सारी चीजें याद रहती थीं। डॉ.श्लेष गौतम ने कहा, निदा फाजली को इलाहाबाद बहुत प्रिय था, वह हर न्योते पर यहां आए। दोहे में असरदार तरीके से अपनी बात कहना उन्हें आता था। जयकृष्ण राय तुषार ने कहा, हमारे बीच से आधुनिक युग का कबीर चला गया। उनकी शायरी, उनके दोहे हमेशा याद रहेंगे। शैलेंद्र मधुर ने कहा, निदा की सादगी ही उनकी खूबी थी, वह हमेशा युवाओं के प्रेरणास्रोत रहेंगे।