पौष पूर्णिमा से कल्पवास करने वालों का एकादशी से माघ मेला क्षेत्र में जमावड़ा होगा। अधिकतर कल्पवासी बृहस्पतिवार तक मेला क्षेत्र पहुंच जाएंगे। तीर्थपुरोहितों के शिविरों में तैयारियां की जा रही हैं। मकर संक्रांति पर सिर्फ दस फीसदी श्रद्धालुओं ने कल्पवास का संकल्प लिया है। नब्बे फीसदी श्रद्धालु पौष पूर्णिमा से कल्पवास करेंगे।
माघ मेला क्षेत्र के काली सड़क, मोरी, जीटीरोड, गंगोली शिवाला, संगम मार्ग और गाटा मार्गों पर स्थित तीर्थपुरोहितों के शिविरों में बुधवार एकादशी से कल्पवासियों की भीड़ होगी। कल्पवासियों के रहने के लिए टेंट लगाए गए हैं। उन्हें पूजन अनुष्ठान एवं गंगा स्नान में सहूलियत रहे इसका भी ख्याल रखा जा रहा है।
तीर्थपुरोहित अनूप त्रिपाठी का कहना है कि अधिकांश कल्पवासी शुक्रवार तक आ जाएंगे। पौष पूर्णिमा को कल्पवास का संकल्प लेंगे। माघ मास पर्यंत स्नान, दान, व्रत और संतों के प्रवचन सुनेंगे।
माघ मेला कल्पवासियों का है पर प्रशासन की ओर से सुविधा पाने के वरीयता क्रम में सबसे निचली पायदान पर हैं। तीर्थपुरोहितों के शिविरों में रहकर कल्पवास करने वालों को बुनियादी सुविधा पाने के लिए कम से कम तीन हजार खर्च करने होंगे। शौचालय के लिए 1250, नल के लिए एक हजार और विद्युत के लिए 650 यानी 29सौ देने होंगे। प्रयाग धर्म संघ के अध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल का कहना है कि प्रशासन संतों महंतों एवं बड़ी संस्थाओं को कई सुविधाएं देती है वहीं कल्पवासियों के लिए बुनियादी सुविधाओं को देने से इंकार कर रही है।
आयुर्वेदाचार्य एस के राय के अनुसार कल्पवास सही मायनों में शरीर शोधन का आध्यात्मिक स्वरूप है। कल्प का तात्पर्य कायाकल्प से है। कायाकल्प यानी शरीर शोधन। इसके अलग अलग विधान है। गंगा तट पर रहकर एक समय भोजन, सूर्य अर्घ्य, स्नान आदि से शरीर का शोधन होता है। महीने भर के अनुशासन से जटिल बीमारियों से राहत पाई जा सकती है।