वाणिज्य कर विभाग के अफसरों की नजर में कर चोरी वही व्यापारी कर रहे हैं, जिनका विभाग में रजिस्ट्रेशन है या फिर वे किसान जिन पर किसी तरह के टैक्स की देनदारी नहीं बनती। सड़कों पर वाहनों की जांच के दौरान ऐसी ही व्यापारियों और किसानों का माल रोका जाता है और कर चोरी के नाम पर 40 फीसदी तक जुर्माना वसूला जाता है। इसके इतर गैर पंजीकृत व्यापारी, ट्रांसपोर्टर बड़ी मात्रा में कर चोरी से माल मंगा रहे हैं। रेलवे से भी प्रतिदिन भारी मात्रा में माल निकलता है। ऐसा लोगों का माल इसलिए नहीं रोका या पकड़ा जाता क्योंकि सड़क पर जांच करने वाले अफसरों से लेकर उच्चाधिकारियों तक से उनकी ‘सेटिंग’ है। विधानसभा की समिति भी कर चोरी और इसमें अफसरों की मिलीभगत पर कई बार शिकायत कर चुकी है। कई मौकों पर वाणिज्य कर कमिश्नर भी अफसरों को सचेत कर चुके हैं, लेकिन इसका जरा भी असर नहीं है।
अफसरों और व्यापारियों की मिलीभगत से पूरे प्रदेश में कर चोरी का बड़ा खेल चल रहा है। सीमेंट, कोयला, ड्राईफ्रूट्स, लोहा, सुपाड़ी, इलेक्ट्रानिक्स गुड्स जैसी कीमतों वस्तुओं में कर चोरी ज्यादा हो रही है, लेकिन इससे जुड़े लोगों और फर्मों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। इस काम में काफी ऐसे लोग जुड़े हैं, जिनका विभाग में पंजीकरण नहीं हैं। ट्रांसपोर्टर और अफसरों के तालमेल से माल सड़कों से धड़ल्ले से गुजर जाता है। शिकार बनते हैं तो पंजीकृत व्यापारी, जो फॉर्म-38 समेत अन्य प्रपत्रों के जरिए माल का परिवहन करते हैं। इधर कुछ समय में ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जब अफसरों ने जोत बही के साथ माल ले जा रहे किसानों को रोक कर 40 फीसदी टैक्स जमा करा लिया। जोत बही होने पर किसान पर किसी तरह के टैक्स की देनदारी होती ही नहीं है।
कर चोरी की वजह से राजस्व में गिरावट दर्ज की गई है। अकेले इलाहाबाद की बात करें तो नवंबर में राजस्व वसूली 85 फीसदी से दिसंबर में घटकर 69 फीसदी रह गई। उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार कल्याण समिति के संयोजक संतोष पनामा का कहना है कि उच्चाधिकारियों की शह पर ही पंजीकृत व्यापारियों और किसानों का उत्पीड़न हो रहा है। उधर, यह हाल तब है जब वाणिज्य कर कमिश्नर मुकेश कुमार मेश्राम तकरीबन हर बैठक में कर चोरी पर लगाम की बात करते हैं। बैठक से निकलने के बाद अफसर उसी काम में लिप्त हो जाते हैं।