फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

छोड़ा जग सारा, वा घर सबसे न्यारा

Wed, 13 Jan 2016 12:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
विज्ञापन
 वा घर सबसे न्यारा, जहां कालिया हमेशा के लिए चले गए लेकिन वा घर और भी न्यारा जहां कालिया अरसे तक रहे। मेहंदौरी स्थित वही घर उनके जाने के साथ एकदम सूना हो गया। संगम में अस्थियां विसर्जित करने के बाद दोस्तों संग बेटे प्रबुद्ध ‘मन्नू’ ने घर पहुंचकर ताला खोला तो सूने कमरे एक-एक कर यादों से भरने लगे। मन्नू से मिलने पड़ोसियों, करीबियों का आना शुरू हुआ तो यादों के पृष्ठ भी खुलते गए।
विज्ञापन


पड़ोस के यादव जी ने कहा, कालिया जी इतने बड़े कद के हैं, हमें नहीं पता था, वह छोटों से भी वैसा ही घुलमिल कर बोलते-बतियाते, उन्हें स्नेह देते। मेरा बेटा भी घंटों उनके पास बैठा रहता। पड़ोसी और जाने-माने सर्जन डॉ.नीरज त्रिपाठी कहते हैं, घर के ठीक सामने का सूना पड़ा मकान देखकर लगता है, जैसे भीतर से निकलकर चहलकदमी करते हुए कालियाजी बाहर आ जाएंगे।कई करीबी, परिचित फूल लेकर पहुंचे तो पता चला अस्थिकलश संगम में विलीन हो चुका है।

लेकिन जल्द ही मेहंदौरी के मकान से ‘कालियॉज’ की नेमप्लेट उतर जाएगी। मकान बेचे जाने के लिए एग्रीमेंट हो चुका है, सिर्फ औपचारिकताएं बाकी हैं। बकौल मन्नू जाने से पहले ही कालिया जी इस मकान के बारे में तय तमाम कर चुके थे। प्रो.अनीता गोपेश, अमित मिश्रा सहित कई अन्य ने स्मृतियां साझा कीं। ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे कालिया जी के ठहाके पूरे माहौल को खुशनुमा बना देते थे। अद्भुत जिजीविषा के धनी कालिया के मायने आने वालों के अलग-अलग थे। मेहंदौरी के इस मकान में ‘गालिब छुटी शराब’ सहित साहित्य और इससे जुड़ी जिम्मेदारियों की जाने कितनी योजनाएं बनीं, बिगड़ीं।
विज्ञापन


वैसे मेंहदौरी के मकान की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। तकरीबन तीन दशक पहले कालिया जी को गंगा स्नान का ऐसा चस्का लगा कि वह तकरीबन रोज ममता जी के साथ रानीमंडी से रसूलाबाद घाट आने लगे। इसी ललक में ही सपना देखा कि गंगा किनारे घर मिल जाए तो गगंातट पर बैठकर अनवरत लेखन करूंगा। फिर क्या था, एक मंत्री को पत्र लिखा, सदियों से जिस तरह ऋषि-मुनि नदियों के किनारे बैठकर साधना करते रहे हैं, उसी परंपरा में मैं भी गंगा तट पर रहकर साहित्य सेवा करना चाहता हूं और यह संकल्प तभी पूरा होगा जब मेंहदौरी में मकान मिल जाए। सरकार ने सुन ली और जल्द ही मकान आवंटित हो गया। शुरुआत में दोनों शनिवार को आते और सोमवार की सुबह लौट जाते। बाद में यही बसेरा हो गया।

प्रख्यात कथाकार रवींद्र कालिया पूरे जीवन जिस सादगी और साफगोई से जिये, उनका अस्थि विसर्जन भी उसी सादगी से हुआ। कोई शोक या श्रद्धांजलि सभा नहीं बल्कि दुरंतों से इलाहाबाद पहुंचे उनके बेटे मन्नू ने कुछ दोस्तों के साथ सीधे संगम जाकर अस्थियां विसर्जित कीं। इससे पहले संगम तट पर अस्थिविसर्जन के कर्मकांड पूरे किए गए। इस दौरान मन्नू के मित्रों के अतिरिक्त संतोष शर्मा, जयकृष्ण राय तुषार, एपी मिश्र आदि मौजूद थे। अस्वस्थ होने के कारण ममता कालिया और बड़ा बेटा अनिरुद्ध नहीं आ सके थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें